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वोकल से लोकल तक : कहलगांव का हस्तशिल्प मेला और आत्मनिर्भर भारत की ज़मीनी सच्चाई कहलगांव में नारायण जन कल्याण संस्थान द्वारा आयोजित इंडियन खादी सह हैंडलूम हैंडीक्राफ्ट मेला का उद्घाटन छह दिन पूर्व सम्पन्न हो चुका है, लेकिन यह आयोजन समय की सीमा से आगे बढ़कर आज भी चर्चा और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह मेला किसी एक दिन की औपचारिक रस्म नहीं, बल्कि उस विचार का सशक्त और जीवंत रूप है, जिसे देश आज “वोकल फॉर लोकल” के नाम से पहचान रहा है। कृष्णा बाबू मैदान में आयोजित इस मेले में देश के करीब 20 राज्यों से आए हस्तशिल्प और हैंडलूम कारीगर अपने पारंपरिक उत्पादों के साथ उपस्थित हैं। भागलपुर और बनारस की सिल्क, कश्मीर का पश्मीना, बंगाल की जामदानी और लखनऊ की चिकनकारी—हर स्टॉल भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और कारीगरों की अथक मेहनत की कहानी कहता नज़र आता है। इस मेले की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह केवल खरीद–फरोख्त का मंच नहीं, बल्कि कारीगर और उपभोक्ता के बीच भरोसे, सम्मान और सीधे संवाद का सेतु है। यहाँ बिकने वाली हर वस्तु केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा, क्षेत्रीय पहचान और कौशल का प्रतीक है। आज के समय में, जब मशीन-निर्मित वस्तुएँ तेज़ी से बाज़ार पर कब्ज़ा कर रही हैं, ऐसे आयोजनों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। यह मेला याद दिलाता है कि हस्तशिल्प सिर्फ उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की बुनियाद है। यह लाखों कारीगर परिवारों के लिए आजीविका का साधन होने के साथ-साथ ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का प्रभावी माध्यम भी है। नारायण जन कल्याण संस्थान का यह प्रयास इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह आयोजन केवल व्यापारिक गतिविधि तक सीमित नहीं है। यह आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को ज़मीनी स्तर पर साकार करता है—जहाँ कारीगरों को बिचौलियों के बिना सीधा बाज़ार मिलता है, उनके श्रम का उचित मूल्य तय होता है और स्थानीय व्यापार को नई गति मिलती है। छह दिन बीत जाने के बाद भी यदि यह मेला लोगों की चर्चा में बना हुआ है, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि समाज अब ऐसे प्रयासों के प्रति जागरूक हो रहा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासनिक सहयोग, जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी और आम नागरिकों की खरीद-सहभागिता—तीनों मिलकर ऐसे आयोजनों को स्थायी और नियमित स्वरूप दें। कहलगांव का यह हस्तशिल्प मेला एक सशक्त संदेश देता है— यदि “लोकल” को वास्तव में “वोकल” बनाना है, तो ऐसे मंचों को केवल आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाना होगा। #वोकलफॉरलोकल #लोकलवोकल #आत्मनिर्भरभारत #हस्तशिल्पमेला #कहलगांव #हैंडलूम #खादी #नारायणजनकल्याणसंस्थान #बिहारहस्तशिल्प #लोकलप्रोडक्ट्स #मेकइनइंडिया #हैंडीक्राफ्ट #ग्रामीणअर्थव्यवस्था #voiceofang #bhagalpurnews #bhagalpur #santoshkumarjha