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अष्टावक्र गीता भारतीय अद्वैत वेदांत का एक अत्यंत गूढ़ और क्रांतिकारी ग्रंथ है। यह ग्रंथ मुक्ति को किसी दूर के लक्ष्य की तरह नहीं, बल्कि अभी और यहीं उपलब्ध सत्य के रूप में प्रकट करता है। जहाँ अधिकांश आध्यात्मिक मार्ग क्रमिक साधना, अभ्यास और प्रयास की बात करते हैं, वहीं अष्टावक्र गीता सीधी मुक्ति (Direct Liberation) का उद्घोष करती है। इस वीडियो में हम समझेंगे कि अष्टावक्र गीता क्यों कहती है कि मनुष्य पहले से ही मुक्त है। बंधन कोई वास्तविक वस्तु नहीं, बल्कि केवल अज्ञान की कल्पना है। जैसे प्रकाश होते ही अंधकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान होते ही बंधन अपने आप समाप्त हो जाता है। अष्टावक्र गीता इसी तात्कालिक बोध की ओर संकेत करती है। राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के संवाद के माध्यम से यह ग्रंथ स्पष्ट करता है कि मुक्ति के लिए संन्यास, त्याग या संसार छोड़ना आवश्यक नहीं है। राजा जनक गृहस्थ रहते हुए भी उसी क्षण मुक्त हो गए, क्योंकि उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप — शुद्ध साक्षी चेतना — को पहचान लिया। इस वीडियो में आप जानेंगे: सीधी मुक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है साधना क्यों कभी-कभी बंधन बन जाती है “मैं शरीर नहीं हूँ” का गहरा रहस्य कर्ता-भाव कैसे बंधन बनाता है मौन और साक्षी भाव की भूमिका जीवनमुक्ति का सच्चा अर्थ अष्टावक्र गीता हमें सिखाती है कि पाने के लिए कुछ भी नहीं है, केवल गलत पहचान को छोड़ना ही मुक्ति है। जब देखने वाला स्वयं को शरीर-मन से अलग साक्षी के रूप में जान लेता है, उसी क्षण दुख, भय और बंधन समाप्त हो जाते हैं। यह वीडियो उन साधकों के लिए है जो सतही ज्ञान नहीं, बल्कि अंतिम सत्य को जानना चाहते हैं। यदि आप आत्मज्ञान, अद्वैत वेदांत, मौन, साक्षी भाव और जीवनमुक्ति जैसे विषयों में रुचि रखते हैं, तो यह वीडियो आपके लिए है।