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#santtukaram #incredible_india #santtukarammaharaj #sant_tukaram_maharaj_temple #pune #maharastra इसवी सन 1608 मे महाराष्ट्र पुणे के देहू गाव नामक छोटे गाव मे एक धनी और पवित्र परिवार मे तुकोबारायंका जन्म हुआ। उनके पूर्व की आठवी पिढी के पूर्वज संत विश्वंभर बाबा पंढरीनाथ के उपासक थे और नियमितरूप से क्षेत्र पंढरपूरकी वारी करते थे। विश्वंभर बाबा ने आठ महामे 16 बार देहू से पंढरपूर ,और फिर पंढरपूर से देहू (4000किमी से जादा) पैदल चलकर वारी कियी विठ्ठल भक्ती मे डुबे विश्वंभर बाबा ने आगे ढलती उम्र मे स्वप्नदृष्टांत के अनुसार आम के वन मे प्राप्त हुई श्री विठ्ठल - रुक्मिणी की मूर्ती(आज भी देहू मे विराजमान है।) अपने कुलदेवता के रूप मे देहू क्षेत्र में मंदिर बांधकर स्थापित की। भागवत धर्म का अर्थात वारकरी संप्रदाय की उपासक होने के कारण श्री तुकाराम महाराज गले मे तुलसी माला, एकादशी वृत्तपरिपालन,माता पिता,गरीब, जनता की सेवा प्रतिवर्षं पंढरी की वारी, एकादशी को भगवान के मंदिर मे कीर्तन और इन सभी आचरों के कारण निषिद्ध कर्मो से अखंड निवृत्ती हो रही थी। तुकोबाराय ने विठ्ठल भक्ती उन्हे उत्तराधिकारी के रूप मे परंपरा से प्राप्त हुए है। श्री छत्रपती शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र का सांस्कृतिक गठण संतों के प्रबोधन के माध्यम से हुआ । वारकरी संप्रदाय के भक्ती आंदोलन ने अध्यात्मिक समता का आरंभ किय। अंधश्रद्धा, कर्मकांड और शूद्र देवताओं के पीछे पडी समाज की अनपढ- गँवार इकाइयों को विवेक कि घुट्टी संतों ने ही पिलाई। संत ज्ञानोबाराय ने भागवत धर्म की नींव रखी; नामदेवराय ने विस्तार किया एकनाथ महाराज इस आंदोलन के आधारस्तंभ बने तो संत तुकोबाराय ने इस भक्ती आंदोलन का क्लास अध्याय रचा। पाखंड का खंडन और अपनी अभंगवाणी का प्रखर रूप मे प्रयोग कर तथा वेदों का अर्थ सामान्य जनों की समझ मे आए ऐसी भाषा मे अभिव्यक्त करने के लिये बोली का काव्यात्मक प्रयोग करने वाली लोक-शैली तुकोबाराय की अभंगवाणी की विशेषता थी। यह लोक-शैली वारकरी संप्रदाय और भागवत धर्म के समाजाभिमुख दर्शन से विकसित हुई।अभंग. भारुड. गुल्ली - डंडा ऐसी लोकरुचियों का खूब इस्तेमाल कर अध्यात्म का पंडिती तरीके का ध्रुव लोकसम्मुख करने मे तुकोबाराय का बहुत बडा हाथ था। :संदर्भ ग्रंथ सूची: महामंडलेश्वर श्रीमंहत विद्यावाचस्पति डॉ रामकृष्णदास महाराज लहवितकर द्वारा लिखित ग्रंथ सौजन्य संत तुकोबाराय का लोकसंवाद तत्वज्ञान काव्यशैली (समीक्षात्मक अध्ययन)