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विषकन्या — एक कालजयी रचना आज 'काव्य हंस' के मंच पर हम एक ऐसी विशेष रचना लेकर आए हैं, जिसका इतिहास अत्यंत भावपूर्ण है। सत्तर के दशक (1970s) में रचित यह कविता लेखक के हृदय के अत्यंत निकट रही है। मित्रों की गोष्ठियां हों या पारिवारिक मिलन, इस रचना की मांग सदैव शीर्ष पर रही है। यह एक प्रेमी का अपनी प्रियतमा (विषकन्या) के प्रति वह उलाहना है, जिसमें प्रेम का समर्पण भी है और उस मायावी आकर्षण की शिकायत भी, जिसने उसे अपने पाश में बांध लिया है। यह रचना एक ऐसे हृदय की पुकार है जो अनुराग और अवसाद के मध्य झूल रहा है। यह एक प्रेमी की उस विषकन्या से मधुर शिकायत है, जिसके सम्मोहन ने उसे प्रेम के ऐसे मार्ग पर ला खड़ा किया है जहाँ से लौटना अब असंभव है। यह गाथा है एक अनचाहे समर्पण की और उस विषैले आकर्षण की, जो प्राणों को तृप्ति भी देता है और पीड़ा भी। सहयोग और संपर्क: यदि आप अपनी रचना को हमारे चैनल पर प्रस्तुत (Feature) करवाना चाहते हैं, तो अपनी कृति हमें यहाँ प्रेषित करें: 9758000934, 9758882253 📧 ईमेल: kaavyahans@gmail.com 📱 इंस्टाग्राम: @KaavyaHans फेस बुक : काव्य-हंस काव्य हंस — जहाँ शब्दों को स्वर मिलते हैं। Hashtags: #KaavyaHans #विषकन्या #हिंदीकविता #प्रेम #काव्य #हिंदीसाहित्य #साहित्यिक #Vishkanya #PoetryInHindi सुनिए... और अनुभव कीजिए इस चिरंतन प्रेम और द्वंद्व को।"