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“लारा- लप्पा” तीन विश्व-विख्यात लेखक- ओ हेनरी, एच.एच. मुनरो, और एंटोव चेखव कि अलग-अलग कहानियों को मिलाकर बनाया गया नाटक है। और ये इतेफ़ाक़ ही है की तीनों कहानीकार अलग अलग महाद्वीपों का प्रीतिनिधित्व करते हैं। अलग महाद्वीपों के कहानियाँ होने के बावजूद आपसी मानवीय सम्बन्ध और भावनायें नाटक का तारतम्य और कथ्य को जोड़े रखता है।पहली कहानी में दुख का भाव एक आदमी को उसके ही घर आये चोर से जोड़ देता है। दूसरी कहानी में एक पार्क में मिले दो अजनबियों के बीच में विश्वास और अविश्वास की आँख मिचौली चलती रहती है। और तीसरी कहानी में हम देखते हैं कि कैसे एक स्त्री की सरलता और प्रेम, एक दिलफेंक आशिक़ का ज़िंदगी बदल देती है। यूँ तो इस नाटक में ईर्ष्या, दया, करुणा, छल-कपट और प्रेम सारे भावों के मोती हैं पर मूलतः हास्य का भाव सबको एक ही सूत्र में पिरोकर रखता है। “Lara-Lappa” is a combination of three different stories by - world renowned writers- O Henry, H.H.Munro and Anton Chekhov. And it is a coincidence that the three storytellers represent three different continents. Despite the stories being from different continents, mutual human relationships and emotions keep the drama's coherence and content connected. In the first story, the feeling of sadness connects a man with a thief who has come to his own house. In the second story, trust and distrust keep going on between two strangers who meet in a park. And in the third story we see how a woman's simplicity and love changes the life of a flirtatious man. Although jealousy, pity, compassion, deceit love and others emotion are the pearl of this play, but basically the sense of humor ties them all together. सार ये नाटक तीन विश्व प्रसिद्ध लेखकों की कहानियों को मिलाकर बनाया गया है।पहली कहानी में दुख का भाव एक आदमी को उसके ही घर आये चोर से जोड़ देता है। दूसरी कहानी में एक पार्क में मिले दो अजनबियों के बीच में विश्वास और अविश्वास की आँख मिचौली चलती रहती है। और तीसरी कहानी में हम देखते हैं कि कैसे एक स्त्री की सरलता और प्रेम, एक दिलफेंक आशिक़ का ज़िंदगी बदल देती है।मूलत ये हास्य प्रधान नाटक है। निर्देशकीय हमारे देश में कहानी कहने-सुनने की कि बड़ी लंबी परंपरा रही है।ख़ुद मुझे भी साहित्य में कहानी की विधा ज़्यादा आकर्षित करती रही है।देश विदेश के कहानीकारों को पड़ते हुये जब भी में कोई कहानी लगती तो उस पर बुक मार्क लगा के छोड़ देता हूँ। उन्हीं कहानियों में से तीन कहानियों खोज के निकाली जिनमें से चेखव की एक कहानी का नाट्य रूपांतरण रंजीत कपूर जी ने पहले ही किया हुआ था।पर उस में भी कुछ नई बात पैदा करनी थी तो उसका भी फिर से नाट्य रूपांतरण किया। फिर कहानियों के मूड के हिसाब से उनका क्रम तय किया और संगीत के माध्यम से उन में एक तारतम्य स्थापित की। मुंबई महानगर की व्यस्ता और जगह के अभाव जैसी समस्याओं के साथ रिहर्सल शुरू हुई।सारे कलाकार अनुभवी होने से जल्द ही नाटक की रंगत खिल कर सामने आने लगी।सब मिला जो नाटक तैयार हुआ वो अब आपके सामने प्रस्तुत है । मंच पर पात्र 1 – नरोत्तम बेन पात्र 2 – भूपेश सिंह पात्र 3 – संदीप दीक्षित पात्र 4 – शैलेन्द्र त्रिवेदी पात्र 5 – श्याम कुमार श्याम / सोनू पाहुजा पात्र 6 – आदित्य त्रिवेदी पात्र 7 – सौरभ पाठक पात्र 8 – मानसी शंकल्या / मीठी सेंगर पात्र 9 – गीतिका श्याम पात्र 10 – राणा प्रताप सेंगर पात्र 11 – मोहम्मद रफी मंच परे निर्देशक – आशीष रावत मंच सज्जा – मनीष दुबे वस्त्र एवं रूप सज्जा – सुनीता दुबे प्रकाश – विजय पोहारे संगीत – आदोर दास