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Shri Lakshmi Kavach | श्री लक्ष्मी कवच | Wealth & Prosperity Mantra | Yogi Voice | Maa Lakshmi | श्री लक्ष्मी कवच एक अत्यंत शक्तिशाली वैदिक कवच है, जिसकी कृपा से धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य, सुख और सुरक्षा प्राप्त होती है। इस कवच का पाठ एवं श्रवण करने से घर में महालक्ष्मी का स्थायी वास होता है और आर्थिक बाधाएँ दूर होती हैं। 🙏 लाभ • धन वृद्धि • नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा • सौभाग्य और ऐश्वर्य • पारिवारिक सुख-शांति 📿 इस वीडियो को प्रतिदिन या शुक्रवार के दिन श्रद्धा से सुनें। 🔔 चैनल को Subscribe करें और वीडियो को Share करें ताकि अधिक लोग महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त कर सकें। जय महालक्ष्मी 🙏 ॥ अथ श्रीलक्ष्मीकवचम् ॥ नारायण उवाच। शृणु विप्रेन्द्र पद्मायाःकवचं परमं शुभम्। पद्मनाभेन यद्दत्तंब्रह्मणे नाभिपद्मके॥1॥ सम्प्राप्य कवचं ब्रह्मातत्पद्मे ससृजे जगत्। पद्मालयाप्रसादेनसलक्ष्मीको बभूव सः॥2॥ पद्मालयावरं प्राप्यपाद्मश्च जगतां प्रभुः। पाद्येन पद्मकल्पे चकवचं परमाद्भुतम्॥3॥ दत्तं सनत्कुमारायप्रियपुत्राय धीमते। कुमारेण च यद्दत्तंपुष्कराय च नारद॥4॥ यद्धृत्वा पाठनाद् ब्रह्मासर्वसिद्धेश्वरो महान्। परमैश्वर्यसंयुक्तःसर्वसम्पत्समन्वितः॥5॥ यद्धृत्वा च धनाध्यक्षःकुबेरश्च धनाधिपः। स्वायम्भुवो मनुःश्रीमान्पठनाद्धारणाद्यतः॥6॥ प्रियव्रतोत्तानपादौलक्ष्मीवन्तौ यतो मुने। पृथुः पृथ्वीपतिःसद्यो ह्यभवद्वारणाद्यतः॥7॥ कवचस्य प्रसादेनस्वयं दक्षः प्रजापतिः। धर्मश्च कर्मणां साक्षीपाता यस्य प्रसादतः॥8॥ यद्धृत्वा दक्षिणे बाहौविष्णुः क्षीरोदशायितः। भक्त्या विधत्ते कण्ठेच शेषो नारायणांशकः॥9॥ यद्धृत्वा वामनं लेभेकश्यपश्च प्रजापतिः। सर्वदेवाधिपःश्रीमान्महेन्द्रो धारणाद्यतः॥10॥ राजा मरुतोभगवानभवद्धारणाद्यतः। त्रैलोक्याधिपतिः श्रीमान्नहुषोयस्य धारणात्॥11॥ विश्वं विजिग्ये खट्वाङ्गःपठनाद्धारणाद्यतः। मुचुकुन्दो यतःश्रीमान्मान्धातृतनयो महान्॥12॥ सर्वसम्पत्पदस्यास्यकवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्छन्दश्च बृहतीदेवी पद्मालया स्वयम्॥13॥ धर्मार्थकाममोक्षेषुविनियोगः प्रकीर्तितः। पुण्यबीजं च महतांकवचं परमाद्भुतम्॥14॥ ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहामे पातु मस्तकम्। श्रीं मे पातु कपालंच लोचने श्रीं श्रियै नमः॥15॥ ॐ श्रीं श्रियै स्वाहेतिच कर्णयुग्मं सदाऽवतु। ॐ श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यैस्वाहा मे पातु नासिकाम॥16॥ ॐ श्रीं पद्मालयायै चस्वाहा दन्तान्सदाऽवतु। ॐ श्रीं कृष्णप्रियायैच दन्तरन्ध्रं सदाऽवतु॥17॥ ॐ श्रीं नारायणेशायैमम कण्ठं सदाऽवतु। ॐ श्रीं केशवकान्तायैमम स्कन्धं सदाऽवतु॥18॥ ॐ श्रीं पद्मनिवासिन्यै स्वाहानाभिं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रेमम वक्षः सदाऽवतु॥19॥ ओं श्रीं मों कृष्णकान्तायै स्वाहापृष्ठं सदाऽवतु। ओं ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहाच मम हस्तौ सदाऽवतु॥20॥ ॐ श्रीनिवासकान्तायैमम पदौ सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहासर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥21॥ प्राच्यां पातुमहालक्ष्मीराग्नेय्यां कमलालया। पद्मा मां दक्षिणे पातुनैरृत्यां श्रीर्हरिप्रिया॥22॥ पद्मालया पश्चिमे मांवायव्यां पातु सा स्वयम्। उत्तरे कमला पातुचैशान्यां सिन्धुकन्यका॥23॥ नारायणी च पातूर्ध्वमधोविष्णुप्रियाऽवतु। सन्ततं सर्वतः पातुविष्णुप्राणाधिका मम॥24॥ इति ते कथितं वत्ससर्वमन्त्रौघविग्रहम्। सर्वैश्वर्यप्रदं नामकवचं परमाद्भुतम्॥25॥ सुवर्णपर्वतं दत्वामेरुतुल्यं द्विजातये। यत्फलं लभते धर्मीकवचेन ततोऽधिकम्॥26॥ गुरुमभ्यर्च्य विधिवत्कवचंधारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौस श्रीमान्प्रतिजन्मनि॥27॥ अस्ति लक्ष्मीर्गृहे तस्यनिश्चला शतपूरुषम्। देवेन्द्रैश्चासुरेन्द्रैश्चसोऽवध्यो निश्चितं भवेत्॥28॥ स सर्वपुण्यवान्धीमान्सर्वयज्ञेषुदीक्षितः। स स्नातः सर्वतीर्थेषुयस्येदं कवचं गले॥29॥ यस्मै कस्मै न दातव्यंलोभमोहभयैरपि। गुरुभक्ताय शिष्यायशरण्याय प्रकाशयेत्॥30॥ इदं कवचमज्ञात्वाजपेल्लक्ष्मीं जगत्प्रसूम्। कोटिसङ्ख्यं प्रजप्तोऽपिन मन्त्रः सिद्धिदायकः॥31॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे तृतीये गणपतिखण्डे नारदनारायणसम्वादे श्रीलक्ष्मीकवचवर्णनं नामाष्टात्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥