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अन्याय की छाया जब धरती पर छाई, तब एक आवाज़ स्वराज्य बनकर आई। वह गुस्सा नहीं, वह धर्म की पुकार, जिसने सिखाया कैसे हो प्रतिकार। मिट्टी में पले, पर्वतों में ढले, संघर्ष के रास्ते खुद ही गढ़े। ताज नहीं माँगा, अधिकार चुना, परिश्रम से ही इतिहास बुना। माँ के शब्द बने जीवन की सीख, सत्य और साहस—यही थी दीक्षा ठीक। झुकना नहीं, पर अन्याय सहना भी नहीं, यही नीति थी, यही राह सही। जहाँ दमन दिखा, वहीं स्वर उठा, न्याय की आग में झूठ जला। तलवार चली तो सोच के साथ, रण नहीं, था धर्म का ही हाथ। दुर्ग-दुर्ग गूँजी स्वराज्य की तान, हर प्रजा में जागा स्वाभिमान। पर्वत बोले, सागर ने माना, यह केवल राजा नहीं, यह युग का पैमाना। शांत मुख पर भी बल की चमक, सीमा टूटे तो बिजली सी दमक। क्षमा थी मन में, पर शर्त के संग, मर्यादा टूटी तो छिड़ा युद्ध-रंग। नारी का मान रहा सबसे ऊपर, प्रजा का दुःख बना अपना दुःख हर पल। राज्य नहीं, जिम्मेदारी थी भारी, इसी से बनी पहचान हमारी। चालों से नहीं, साहस से जीते, कम शब्दों में बड़े अर्थ सीते। एक निर्णय, एक ही वार, और बदल गया समय का आकार। आज भी बहता वही स्वाभिमान, हर हृदय में वही तूफ़ान। यह कहानी नहीं, यह सीख समाज, जय भवानी, जय शिवाजी महाराज। स्वराज्य का दीप जो उन्होंने जलाया, वह युगों तक अंधेरा मिटाता आया। न तब झुके, न अब झुकेंगे हम आज, जय भवानी, जय शिवाजी महाराज। Created by: Hardik Sharma Mayank sagar Aarush Morya Aman negi Vaibhav