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यह वाणी भटके हुए मन को उसके असली घर की याद दिलाती है। भंवरे की तरह मन भी विषयों के फूलों में उलझा रहता है, जबकि सच्चा अमृत भीतर ही विराजमान है। गुरु की वाणी मन को ठहराव देती है, माया के मीठे जाल से निकालकर प्रभु-स्मरण की ओर ले जाती है। जब मन अहंकार छोड़कर कमल समान प्रभु चरणों में टिक जाता है, तभी उसे सच्ची शांति और विश्राम मिलता है। यह केवल शब्द नहीं— आत्मा को जगाने वाला अनुभव है। 🌸🕉️ रे मन काहे भटके भंवरा, विषय पुष्प की आस..." क्या आपका मन भी अशांत है और दुनिया की भीड़ में खोया हुआ है? संत कबीर दास जी का यह कालातीत दोहा हमें याद दिलाता है कि असली सुख बाहर नहीं, हमारे अपने भीतर है।