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Sung by: Shailly Kapoor Poet: Mirza Ghalib Music: Jagjit Singh फिर कुछ इक दिल को बेक़रारी है सीना जूया ए ज़ख़्म ए कारी है चश्म दल्लाल ए जिन्स ए रुसवाई दिल ख़रीदार ए ज़ौक़ ए ख़्वारी है दिल हवा ए ख़िराम ए नाज़ से फिर मेह्शारिस्तान ए बेक़रारी है जलवा फिर अर्ज़ ए नाज़ करता है रोज़ ए बाज़ार ए जाँ सिपारी है फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं फिर वही ज़िन्दगी हमारी है हो रहा है जहान में अंधेर ज़ुल्फ़ की फिर सरिश्ता-दारी है फिर खुला है दर ए अदालत ए नाज़ गर्म बाज़ार ए फ़ौज-दारी है फिर दिया पारा ए जिगर ने सवाल एक फ़रयाद ओ आह ओ ज़ारी है फिर हुए हैं गवाह ए इश्क़ तलब अश्क-बारी का हुक्म जारी है फिर जिगर खोदने लगा नाख़ून आमद ए फ़सल ए लालाकारी है दिल ओ मिज़गां का जो मुक़दमा था आज फिर उस कि रूब-कारी है बे-ख़ुदी बे सबब नहीं ग़ालिब कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है