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यह अद्भुत चित्र अष्टावक्र ऋषि और राजा जनक के बीच हुए उस दिव्य संवाद को दर्शाता है, जिसने आत्मज्ञान की दिशा में मानवता को एक नई दृष्टि दी। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि सच्चा ज्ञान बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि भीतर की जागृति से प्राप्त होता है। राजा जनक जैसे सम्राट भी जब सत्य की खोज में झुकते हैं, तो यह दर्शाता है कि आत्मा के मार्ग पर अहंकार का कोई स्थान नहीं होता। अष्टावक्र ऋषि ने राजा जनक को बताया कि मनुष्य शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना है। जब व्यक्ति स्वयं को शरीर और मन से अलग जान लेता है, तब ही उसे वास्तविक मुक्ति का अनुभव होता है। यही शिक्षा इस चित्र के माध्यम से जीवंत होती है — एक ओर राजसी वैभव और दूसरी ओर वैराग्य की दिव्यता। यह दिव्य संवाद हमें सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी मन को निर्लिप्त रखा जा सकता है। आत्मज्ञान कोई दूर की वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं की पहचान है। जब हम भीतर झांकते हैं, तभी जीवन का सच्चा रहस्य प्रकट होता है। 🌺 यह कथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज भी हमारे जीवन के लिए उतनी ही प्रासंगिक है। यदि हम भी राजा जनक की तरह जिज्ञासु बनें और अष्टावक्र ऋषि की वाणी को आत्मसात करें, तो जीवन में शांति, संतुलन और आनंद स्वतः आ सकता है। #अष्टावक्रऋषि #राजाजनक #अष्टावक्रगीता #आत्मज्ञान #सनातनधर्म #आध्यात्मिकता #वेदांत #ध्यान #मोक्षमार्ग #भारतीयसंस्कृति #SpiritualWisdom