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हिंदी गीत के बोल निश्शब्दता ही गूँज उठी, सृष्टि की वेदना बोल उठी, वस्त्रहीन सारे लोक जब शरण माँगने लगे… शिव ही बोले तब। आकाश प्रश्नों से भर गया, संदेह में समय ठहर गया, देवता और मुनि सब मिलकर कैलास में शरण को आए। भस्मधारी करुणामय प्रभु नेत्र तृतीय खोले धीरे-धीरे, “लोक को वस्त्र चाहिए,” यही शिव संकल्प चमक उठा। जटाजूट के दिव्य तेज से देवाला ऋषि अवतरित हुए। “वैकुण्ठ को जाओ पुत्र, नारायण के दर्शन पाओ, सृष्टि-सूत्र वह दिव्य तंतु लोक के लिए ले आओ।” मेघों के ऊपर वे चले, मंत्र ही उनका मार्ग बने, हर कदम एक यज्ञ बन गया, दृढ़ निश्चय से देवाला बढ़े। चरण – वैकुण्ठ दर्शन कमल आसन पर नारायण, काल के भी वे रक्षक हैं, नील मेघ सा रूप धरे, करुणा की मुस्कान बिखेरी। “यह तंतु धर्ममय है, सृष्टि का यही सूत्र है,” कहते ही देवाला के हाथों में दिव्य प्रकाश प्रवाहित हुआ। काल बदले, तंतु न बदले, धर्म कभी न मिट पाए, जब तक हाथ सूत चलाते रहें, शिव संकल्प अमर रह जाए। ॐ नमः शिवाय… ॐ नमो नारायणाय…