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A tale about Srikrishna visiting Assam; then pragjyotish.. बहुत समय पहले, जब वन मंत्रों से गूंजते थे और राजाओं के निर्णयों में देवताओं की छाया होती थी, पूर्व दिशा में एक दिव्य नगर था — प्राग्ज्योतिष। यह नगर चमकता था, जैसे पृथ्वी पर उतरा हुआ कोई नक्षत्र। इस नगर का राजा था बाणासुर — अपार शक्ति से संपन्न, भगवान शिव का महान भक्त, हज़ार भुजाओं से युक्त। परंतु उसकी शक्ति के साथ-साथ उसका अहंकार भी उतना ही विशाल था। उसी राजमहल में रहती थी उसकी पुत्री उषा — चंद्रमा-सी कोमल, प्रभात-सी उज्ज्वल और हृदय से अत्यंत संवेदनशील। 🌸 एक स्वप्न जिसने भाग्य बदल दिया एक रात्रि, जब सारा संसार मौन था, उषा ने एक स्वप्न देखा। उसने एक युवा राजकुमार को देखा — शांत नेत्र, निर्भीक मुस्कान और ऐसा तेज, मानो आत्मा उसे पहले से जानती हो। नींद खुली तो उसकी आँखों में आँसू थे और हृदय में प्रेम। व्याकुल होकर उसने अपनी सखी चित्रलेखा से मन की बात कही, जिसे दिव्य दृष्टि का वरदान प्राप्त था। चित्रलेखा ने ध्यान लगाया और बोली— “यह कोई साधारण युवक नहीं है। यह अनिरुद्ध है — श्रीकृष्ण के पौत्र, वीरता और करुणा का प्रतीक।” दैवी शक्ति से चित्रलेखा अनिरुद्ध को गुप्त मार्गों से, आकाश और दिशाओं को पार कर, उषा के कक्ष में ले आई। और इस प्रकार — न युद्ध से, न विजय से — प्रेम ने प्रवेश किया। 🔗 अहंकार की बेड़ियाँ कुछ समय तक उषा और अनिरुद्ध का जीवन शांत आनंद में बीता। परंतु सत्य अधिक समय तक छिपा नहीं रहता। जब बाणासुर को यह ज्ञात हुआ, तो उसका क्रोध प्रचंड हो उठा। शक्ति के मद में उसने धर्म को भुला दिया और अनिरुद्ध को बंदी बना लिया। वह यह नहीं जानता था कि उसने केवल एक राजकुमार को नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण तक जाने वाले मार्ग को बाँध दिया है। 🐚 श्रीकृष्ण का आगमन जब यह समाचार द्वारका पहुँचा, तो श्रीकृष्ण उठ खड़े हुए — न क्रोध से, बल्कि धर्म की रक्षा के संकल्प से। बलराम और यादव सेना के साथ वे प्राग्ज्योतिष की ओर बढ़े। धरती काँप उठी। आकाश साक्षी बना। किले टूटे। शस्त्र टकराए। और तभी— भगवान शिव स्वयं श्रीकृष्ण के सम्मुख खड़े हुए। न शत्रु बनकर, बल्कि एक भक्त के रक्षक के रूप में। उस क्षण हरि और हर आमने-सामने थे — दोनों शांत, दोनों दिव्य, कोई द्वेष नहीं, केवल धर्म। 🌿 विजय से बड़ी करुणा श्रीकृष्ण ने बाणासुर के अहंकार को तोड़ने के लिए उसकी भुजाएँ एक-एक कर काटीं — मारने के लिए नहीं, झुकाने के लिए। अंततः बाणासुर पराजित नहीं, विनम्र हो गया। तब भगवान शिव आगे आए और करुण स्वर में बोले— “हे कृष्ण, इसे क्षमा करें।” श्रीकृष्ण मुस्कुराए। वे सदैव ऐसे ही करते हैं। बाणासुर का जीवन बचा — अहंकार नष्ट हुआ। अनिरुद्ध मुक्त हुए। और उषा का प्रेम सम्मानित हुआ, दंडित नहीं। उषा और अनिरुद्ध का विवाह हुआ — केवल दो हृदयों का नहीं, धर्म की अहंकार पर विजय का उत्सव। 🌼 इस कथा का संदेश यह केवल देवताओं और युद्ध की कथा नहीं है। यह हमें सिखाती है कि— सत्य से जुड़ा प्रेम कभी कैद नहीं हो सकता शक्ति को करुणा के आगे झुकना ही पड़ता है और सबसे महान विजय होती है — क्षमा आज भी प्राग्ज्योतिष की हवाओं में मानो यह स्वर गूंजता है— “जब अहंकार मौन होता है, तब करुणा बोलती है।”