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क्या सच में जीवन का अंतिम लक्ष्य मौन है? क्या शांति कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर पहले से मौजूद है? “मौन ही परम उद्देश्य है” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का सार है। हम जीवन भर कुछ पाने की दौड़ में लगे रहते हैं—सुख, सफलता, प्रेम, सम्मान। लेकिन क्या कभी रुककर यह देखा है कि इन सबके पीछे हमारी वास्तविक खोज क्या है? हम शांति चाहते हैं… और शांति का अंतिम रूप है मौन। यह मौन बाहरी चुप्पी नहीं है। यह भीतर की वह अवस्था है जहाँ विचारों का शोर समाप्त हो जाता है। जहाँ ‘मैं’ और ‘मेरा’ की पकड़ ढीली पड़ जाती है। जहाँ मन शांत होकर साक्षी में विलीन हो जाता है। जब मन की तरंगें रुकती हैं, तब जो शुद्ध जागरूकता शेष रहती है—वही हमारा वास्तविक स्वरूप है। उसी को आत्मा, चैतन्य या सत्य कहा गया है। मौन किसी साधना की उपलब्धि नहीं, बल्कि हमारी मूल प्रकृति है। हमें उसे बनाना नहीं है, केवल पहचानना है। इस विषय में हम जानेंगे: मौन का वास्तविक अर्थ क्या है मौन और साक्षी भाव का संबंध क्यों खोज ही बाधा बन जाती है कैसे बिना प्रयास के मौन प्रकट होता है और कैसे मौन में ही सच्ची मुक्ति छिपी है जब भीतर मौन उतरता है, तब जीवन वैसा ही रहता है—पर अनुभव बदल जाता है। क्रियाएँ होती हैं, पर कर्तापन नहीं रहता। संबंध रहते हैं, पर आसक्ति नहीं। संसार चलता है, पर भीतर स्थिरता बनी रहती है। यदि आप भी जीवन की भागदौड़ से थक चुके हैं और सच्ची शांति की तलाश में हैं, तो यह चिंतन आपके लिए है। शायद उत्तर कहीं बाहर नहीं… शायद वह मौन, अभी और यहीं, आपके भीतर प्रतीक्षा कर रहा है। 🌿 मौन को खोजिए मत… उसे पहचानिए। क्योंकि मौन ही परम उद्देश्य है।