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स्वर्ग भव थी उतरी गांवत्रीगंगा रे जमना भजन||मणिराम महराज अनपुरा का भजन|| 84studio 360#chbhanjan 360 यह भजन गुजराती भक्ति साहित्य का एक बहुत ही लोकप्रिय अंश है। स्वर्ग भव थी उतरी गावतरी, गंगा रे जमना ना दीवा करती रे... हो... गावतरी माँ, स्वर्ग थी उतरी रे। कड़ी १: (देवताओं का वास) त्रण सो ने साठ देवो गाय माँ वसे, सूरज ने चंदर जेनी आंखो माँ वसे, पवन पांखो फहरावती रे... हो... गावतरी माँ, स्वर्ग थी उतरी रे। कड़ी २: (पवित्र नदियाँ) चार पांसे जेना गंगाजी नी धार छे, पग ना खुर माँ तीर्थो नो वास छे, अमृत नी धारा वहावती रे... हो... गावतरी माँ, स्वर्ग थी उतरी रे। कड़ी ३: (भक्तों की सेवा) धूप-दीप ने आरती थई रही, श्रद्धा थी दुनिया सेवा करी रही, पुण्य ना पंथ बतावती रे... हो... गावतरी माँ, स्वर्ग थी उतरी रे। भजन का भावार्थ: देव स्वरूप: गाय की आँखों में सूर्य और चंद्रमा का वास है और उसके शरीर में ३६० (या ३३ कोटि) देवता निवास करते हैं। तीर्थ स्वरूप: गाय के खुरों (पैर) में समस्त तीर्थों का वास माना गया है। जहाँ गाय खड़ी होती है, वह स्थान पवित्र हो जाता है। अमृत धारा: गाय का दूध अमृत के समान है जो संसार का पोषण करता है। प्रकाश: "गंगा रे जमना ना दीवा करती" का अर्थ है कि गाय अपने दिव्य प्रकाश से अंधकार (अज्ञान) को मिटाती है। क्या आप इस भजन को किसी खास गायक की आवाज़ में सुनना पसंद करते हैं, या आप इसके कठिन शब्दों का अर्थ जानना चाहते हैं?