У нас вы можете посмотреть бесплатно महाकवियों की दृष्टि में सीता-राम का व्यक्तित्व । वाल्मीकि, तुलसीदास, निराला । Literature on Sita-Ram или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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राम और सीता की कथा हमेशा से हिंदी साहित्य का प्रिय विषय रहा है। हर युग में इस कथा को अपनी-अपनी दृष्टि से देखा गया है। राम के समकालीन महर्षि वाल्मीकि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास और आधुनिक युग के सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तक ने रामकथा को अपनी दृष्टि दी है। इसका विश्लेषण कर रहे हैं, देवांशु झा। ------------------ #Ramayan #RamcharitManas #Valmiki #Tulsidas #SuryakantTripathiNirala #Nirala #ShriRam #Sita #Dusshera #RamKatha #Ramlila #Indix #IndixOnline #HindiKavita #HindiPoetry #HindiSahitya #साहित्य #DevanshuJha #Vangaman #वनगमन राम-रावण युद्ध ------------------- यह भी देखें: 1. धर्म, समाज और साहित्य - • Principle of Sanatan Dharm । Hinduism । Li... 2. भीष्म और आज का भारत- • Importance of Bhishma Pitamah । महाभारत के... 3. कर्ण, नायक या खलनायक? - • Was injustice done to Karna in Mahabharata... 3. एक अनोखी मृत्यु सूचना- • उद्योगपति जय हरि डालमिया के निधन का संदेश,... ------------------ Please Follow Indix on Social Media Youtube: / indixonline Facebook: / indixonline Koo: https://www.kooapp.com/profile/IndiX Twitter: / indixonline Instagram: / indixonline Telegram: https://t.me/indixchannel ----------- महर्षि वाल्मीकि यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्गन्ती कृशकण्टकान (यदि आप वन जा रहे हैं राघव तो मुझे भी अपने साथ ले चलिए। मैं वन में आपके आगे चलती हुई कांटों को साफ करूंगी। ) तुलसीदास चलन चहत बन जीवननाथु, केहि सुकृति सन होइहि साथु की तनु प्रान कि केवल प्राना. विधि करतबु कछु जाई न जाना (प्राणनाथ वन जा रहे हैं। अब मुझे अपने तन और प्राण दोनों के साथ वन जाने का सौभाग्य मिलेगा या केवल प्राण ही वन जा सकेंगे ? भाग्य का खेल कोई नहीं जानता..) सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तू गई स्वर्ग क्या यह विचार- जब पिता करेंगे मार्ग पार यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम तारूंगी कर गह दुस्तर तम.. (तू मुझसे पहले स्वर्ग क्या यह सोचकर गईं कि जब अक्षम पिता रास्ता पार करेंगे तब तुम उस पथ पर पसरे दुस्तर अंधकार को काटोगी..) गोदावरीं प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण आबन्धिष्येथवा त्यक्ष्ये विषमे देहात्मन: पिबामि वा विषं तीक्ष्णं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम न त्वहं राघवादन्यं कदापि पुरुषं स्पृशे (गोदावरी में कूद जाऊंगी, गले में फांसी लगाकर मर जाऊंगी, किसी पर्वत से नीचे छलांग लगाऊंगी, तीव्र विषपान कर लूंगी अथवा प्रचण्ड अग्नि में भस्म हो जाऊंगी किन्तु राघव के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष को स्पर्श नहीं करूंगी।) अपहृत्य शचीं भार्यां शक्यमिन्द्रस्य जीवितुम नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान भवेत.. (मूर्ख रावण, इन्द्र की पत्नी शची का अपहरण करने वाला एक बार बच भी सकता है किन्तु राम की भार्या को हरने वाला नहीं बच सकता। उसे ब्रह्मा भी नहीं बचा सकते..! गौरव और विश्वास से दीप्त हैं जानकी। कैसा अभिमान है उन्हें अपने राम पर।) निराला फूटी स्मिति सीता ध्यानलीन राम के अधर फिर विश्वविजय भावना हृदय में आई भर लख शंकाकुल हो गए अतुल बल शेष शयन खिंच गए दृगों में सीता के राममय नयन अस्ति कच्चित्त्वयादृष्टा सा कदम्बप्रिया प्रिया... स्वर्गोपि हि तया हीन: शून्य एव मतो मम: तन्मामुत्सृज्य हि वने गच्छायोध्यापुरीं शुभाम (सीता के बिना तो स्वर्ग भी सूना लगेगा। लक्ष्मण तुम मुझे यहीं छोड़कर अयोध्या लौट जाओ, मैं विदेहराज को क्या उत्तर दूंगा) मया विहीना विजने वने सा रक्षोभिराहृत्य विकृष्यमाणा नूनं विनादं कुररीव दीना सा मुक्त मुक्तवत्यायतकान्तनेत्रा (मेरे बिना सीता को राक्षसों ने घसीटा होगा, उसे बहुत पीड़ा पहुंचायी होगी तब वह बेचारी कुररी की तरह विलाप करती रही होगी।) तुलसी तो और सूक्ष्म हो जाते हैं, पूछत चले लता तरु पाती सीता चितव स्याम मृदु गाता परम प्रेम लोचन न अघाता मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं जय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी। हनुमान को सामने पाकर सीता की मनोदशा देखिए.. बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी। या राम का संदेश.. कहेउ राम वियोग तव सीता। मो कहुं सकल भएल बिपरीता। नव तरु किसलय मनहुं कृसानु। कालनिसा सम निसि ससि भानू।। सीता कहती हैं.. अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।। नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठिबाधा।। निराला के राम पुरुषोत्तम तो हैं किन्तु उनके संशय मनुज जैसे हैं। इसलिए जानकी के प्रेम में डूबे राम बार-बार कांप उठते हैं- स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय रह रह उठता जग-जीवन में रावण जय भय ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत जानकी हाय उद्धार प्रिया का हो न सका वह एक और मन रहा राम का जो न थका