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शिव और शक्ति का संबंध केवल देव–देवी का नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के मूल सत्य का प्रतीक है। शिव शुद्ध चेतना हैं, वह मौन हैं, स्थिर हैं, असीम हैं। शक्ति उस चेतना की सक्रिय ऊर्जा हैं, जो सृष्टि को गति देती है, आकार देती है और परिवर्तन का कारण बनती है। शिव बिना शक्ति के शव समान माने गए हैं और शक्ति बिना शिव के दिशाहीन ऊर्जा। इसी कारण कहा गया है कि शिव और शक्ति अलग नहीं, एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं। शिव को पुरुष तत्व कहा गया है, जो साक्षी भाव में स्थित रहते हैं। वह न सृजन करते हैं, न संहार की इच्छा रखते हैं, केवल सब कुछ होते हुए देखते हैं। वहीं शक्ति स्त्री तत्व हैं, जो इच्छा, ज्ञान और क्रिया की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। शक्ति ही ब्रह्मा से सृष्टि कराती हैं, विष्णु से पालन कराती हैं और रुद्र से संहार कराती हैं। अर्धनारीश्वर का स्वरूप शिव–शक्ति की अद्भुत एकता का सबसे गहरा प्रतीक है। इस रूप में आधा शरीर शिव का और आधा शक्ति का होता है, जो यह दर्शाता है कि पुरुष और स्त्री, स्थिरता और गति, ज्ञान और क्रिया—सब एक ही सत्य के अभिन्न भाग हैं। यह रूप यह भी सिखाता है कि संतुलन के बिना सृष्टि संभव नहीं। तंत्र शास्त्र में शक्ति को कुंडलिनी के रूप में माना गया है, जो मानव शरीर में मूलाधार में सुप्त अवस्था में रहती हैं। जब साधना द्वारा यह शक्ति जाग्रत होकर सहस्रार तक पहुँचती है, तब वह शिव से मिलन करती है। यही मिलन आत्मज्ञान, समाधि और मोक्ष का द्वार खोलता है। इसीलिए कहा गया है कि साधना में शक्ति का जागरण और शिव में लय होना ही अंतिम लक्ष्य है। शिव विनाश के देवता नहीं, बल्कि परिवर्तन के अधिपति हैं और शक्ति केवल माया नहीं, बल्कि चेतना को व्यक्त करने वाली दिव्य शक्ति हैं। जब जीवन में स्थिरता आती है तो शिव का तत्व कार्य करता है और जब परिवर्तन आता है तो शक्ति सक्रिय होती हैं। हर श्वास में शक्ति है और हर शांति में शिव। शिव और शक्ति का रहस्य यह सिखाता है कि संसार में जो भी द्वैत दिखाई देता है, वह वास्तव में एक ही सत्य का विस्तार है। जब साधक इस सत्य को अनुभव कर लेता है, तब बाहर शिव की खोज समाप्त हो जाती है और भीतर शक्ति जाग्रत होकर स्वयं शिव का साक्षात्कार करा देती।