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"जो तोकूं काँटा बुवै" संत कबीर दास जी का अत्यंत प्रसिद्ध और गहन दोहा है। इस अमर वाणी में कबीर जी ने अहिंसा, करुणा और मानवता का अद्भुत संदेश दिया है। वे कहते हैं कि यदि कोई तुम्हारे लिए काँटा बोता है, तो तुम्हें उसके लिए फूल बोना चाहिए। यह दोहा हमें यह सिखाता है कि द्वेष और हिंसा का उत्तर प्रेम और करुणा से देना ही सच्ची साधना है। इस दोहे का भाव है – "जो तोकूं काँटा बुवै, ताहि बूवै तू फूल" अर्थात यदि कोई तुम्हारे लिए काँटा बोता है, तो तुम उसके लिए फूल बोओ। कबीर जी हमें यह सिखाते हैं कि बदले की भावना से जीवन व्यर्थ होता है। सच्चा साधक वही है जो द्वेष का उत्तर प्रेम से देता है और गुरु की शरण में रहकर सतनाम का स्मरण करता है। 🌿 भजन/दोहा का आध्यात्मिक संदेश अहिंसा का महत्व: द्वेष और हिंसा का उत्तर प्रेम और करुणा से देना चाहिए। मानवता का सार: दूसरों के लिए भलाई करना ही सच्चा धर्म है। गुरु का मार्गदर्शन: गुरु ही वह शक्ति हैं जो जीव को सही दिशा दिखाते हैं। भक्ति का सार: नाम‑स्मरण और ध्यान ही आत्मा को शुद्ध करते हैं और परमात्मा से जोड़ते हैं। जीवन का उद्देश्य: आत्मा को परमात्मा से जोड़ना और प्रेम से जीवन जीना ही साधना का सार है। 🎶 भावनात्मक प्रभाव यह दोहा सुनते समय श्रोता को गहरी आत्मिक जागृति और जीवन के सत्य की अनुभूति होती है। कबीर जी की वाणी हमें यह याद दिलाती है कि द्वेष का उत्तर प्रेम से देना ही सच्ची भक्ति है। 🌟 निष्कर्ष "जो तोकूं काँटा बुवै" केवल एक दोहा नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। कबीर जी की वाणी हमें यह सिखाती है कि द्वेष और हिंसा का उत्तर प्रेम और करुणा से देना चाहिए। गुरु की शरण और नाम‑स्मरण ही वह मार्ग है जो जीव को सच्ची मुक्ति और शांति प्रदान करता है। यह दोहा हर उस व्यक्ति के लिए है जो आत्मिक शांति, भक्ति और सत्य की खोज में है