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यह कहानी है एक गरीब लेकिन नेक दिल बाप और उसकी पाक दामन बेटी की। एक छोटे से कस्बे के किनारे, कच्ची मिट्टी के घर में रहते थे हाजी करीम बख्श। लोग उन्हें “हाजी साहब” कहते थे, हालाँकि उनके पास न बड़ी दुकान थी, न ज़मीन-जायदाद। बस एक पुरानी सी सिलाई मशीन और मेहनत से कमाया हुआ हलाल रिज़्क। उनकी एक ही बेटी थी — आयशा। बड़ी-बड़ी मासूम आँखें, चेहरे पर हया, लिबास सादा लेकिन दिल बहुत अमीर। माँ का साया बचपन में ही उठ गया था। तब से आयशा ही घर की बेटी भी थी, माँ भी थी, और अपने बाप की तसल्ली भी। हाजी साहब अक्सर कहते, “बेटी, गरीबी कोई शर्म की बात नहीं… बस इंसान का दिल गरीब नहीं होना चाहिए।” आयशा मुस्कुरा कर जवाब देती, “अब्बा, जब आप मेरे साथ हैं तो मुझे किसी दौलत की जरूरत नहीं।” उनका घर छोटा था, दीवारों पर सीलन थी, छत से कभी-कभी पानी टपकता था। मगर उस घर में सुकून था। हर फज्र की नमाज़ के बाद हाजी साहब कुरआन की तिलावत करते और आयशा चूल्हे पर चाय चढ़ा देती।