У нас вы можете посмотреть бесплатно समुद्र मंथन की सम्पूर्ण कथा | Samudra Manthan Story in Hindi अमृत से लेकर नीलकंठ तक или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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“नमस्कार भक्तों! आज हम आपको ले चलेंगे उस दिव्य क्षीरसागर में, जहाँ देवता और असुर आमने-सामने खड़े थे… जहाँ निकला भयंकर विष, प्रकट हुए चौदह दिव्य रत्न, और जहाँ से जन्मा अमृत — यह है समुद्र मंथन की अद्भुत और रहस्यमयी कथा!” “जब देवताओं का तेज क्षीण हो गया, जब अधर्म का भार तीनों लोकों पर बढ़ने लगा, तब क्षीरसागर की अथाह गहराइयों में हुआ एक ऐसा दिव्य मंथन, जिसने सृष्टि को विष भी दिया और अमृत भी—इसी को समुद्र मंथन कहा जाता है।” एक समय की बात है, स्वर्गलोक अपने वैभव और ऐश्वर्य के शिखर पर था। देवराज इंद्र अपने पराक्रम और ऐश्वर्य से अभिभूत रहते थे। एक दिन महर्षि दुर्वासा स्वर्ग आए और उन्होंने इंद्र को देवी लक्ष्मी का प्रतीक एक दिव्य पुष्पमाला भेंट की। अहंकारवश इंद्र ने उस माला को आदरपूर्वक धारण नहीं किया, बल्कि अपने वाहन ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। ऐरावत ने उसे सूँड से गिरा दिया और माला भूमि पर कुचल गई। यह दृश्य देखकर दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा— “इंद्र! तूने लक्ष्मी का अपमान किया है। आज से देवता श्रीहीन, बलहीन और पराजित होंगे।” ऋषि के श्राप से देवताओं की शक्ति नष्ट होने लगी। यज्ञ निष्फल होने लगे, वैभव छिन गया और असुरों ने अवसर पाकर स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। देवता पराजित हो गए और स्वर्ग उनके हाथों से निकल गया। पराजित देवता ब्रह्मा जी के साथ क्षीरसागर में भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। भगवान विष्णु ने शांत स्वर में कहा— “देवताओं, तुम्हारी शक्ति क्षीरसागर के मंथन से प्राप्त अमृत से ही लौट सकती है। परंतु यह कार्य अकेले संभव नहीं। असुरों से संधि करो।” देवताओं ने विष्णु की आज्ञा स्वीकार की। देवता असुरों के पास गए। संधि हुई कि— मंदराचल पर्वत मथानी बनेगा वासुकी नाग रस्सी होंगे समुद्र से जो भी निकलेगा, उसे बाँटा जाएगा मंथन आरंभ हुआ। मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार धारण कर उसे अपनी पीठ पर स्थिर किया। सबसे पहले समुद्र से एक भयंकर, ज्वालामुखी समान पदार्थ निकला— हलाहल विष। उसकी अग्नि से स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोक जलने लगे। देवता और असुर मृत्यु से भयभीत हो उठे और सभी महादेव शिव की शरण में पहुँचे। महादेव ने सृष्टि की रक्षा के लिए वह विष पी लिया और उसे अपने कंठ में रोक लिया। उनका कंठ नीला हो गया और तभी से वे कहलाए— नीलकंठ महादेव। विष के शांत होने के बाद समुद्र से प्रकट हुई कामधेनु, सभी इच्छाएँ पूर्ण करने वाली दिव्य गौ। देवताओं ने इसे ऋषियों को सौंप दिया ताकि यज्ञ, तप और धर्म अविरत चलते रहें। फिर समुद्र से निकला एक विशाल, श्वेत, चार दाँतों वाला हाथी— ऐरावत। देवराज इंद्र ने इसे अपना वाहन बनाया। यह स्वर्ग की राजसत्ता और शक्ति का प्रतीक बना। इसके बाद प्रकट हुआ सात मुखों वाला दिव्य अश्व— उच्चैःश्रवा। असुरराज बलि ने इसे प्राप्त किया। यह तेज, गति और वीरता का प्रतीक था। फिर समुद्र से निकला कल्पवृक्ष, जो मनचाही वस्तु प्रदान करता था। इसे स्वर्गलोक में स्थापित किया गया, लेकिन यह भी सिखाता है कि असीम इच्छाएँ मनुष्य को बाँध भी सकती हैं। इसके बाद प्रकट हुई अत्यंत तेजस्वी कौस्तुभ मणि। भगवान विष्णु ने इसे अपने वक्षस्थल पर धारण किया। यह दिव्य चेतना और सत्य का प्रतीक बनी। मंथन से शीतल और सौम्य चंद्रमा प्रकट हुए। महादेव ने इन्हें अपनी जटाओं में धारण किया ताकि हलाहल विष की उष्णता शांत हो सके। इसके बाद प्रकट हुईं वरुणी देवी, मदिरा की अधिष्ठात्री। असुरों ने उन्हें स्वीकार किया, क्योंकि उनका मार्ग भोग और आसक्ति का था। फिर समुद्र से रंभा, मेनका, उर्वशी जैसी दिव्य अप्सराएँ निकलीं। वे स्वर्गलोक की शोभा बनीं, लेकिन साथ ही मोह और आकर्षण का प्रतीक भी। इसके बाद क्षणभर के लिए सारा संसार शांत हो गया। समुद्र से स्वर्ण कमल पर विराजमान माता लक्ष्मी प्रकट हुईं। उन्होंने भगवान विष्णु को वरमाला पहनाई और सदा उनके साथ रहने का वर माँगा। यह दर्शाता है कि धन और वैभव केवल धर्म के साथ ही शोभा देता है। फिर समुद्र से भगवान विष्णु के अवतार धन्वंतरि प्रकट हुए। उनके हाथ में था अमृत कलश। वे आयुर्वेद और चिकित्सा के देवता बने। अमृत को देखते ही असुरों की नीयत बदल गई। वे उसे छीनने लगे। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार धारण किया। उनके सौंदर्य से असुर मोहित हो गए और अमृत वितरण का कार्य मोहिनी को सौंप दिया। मोहिनी ने चतुराई से देवताओं को अमृत पिला दिया। एक असुर स्वर्भानु देवता का रूप धरकर अमृत पीने बैठ गया, पर सूर्य और चंद्र ने पहचान लिया। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। वह राहु और केतु बना। अमृतपान से देवता पुनः शक्तिशाली और अमर हो गए। असुर पराजित हुए। इंद्र ने स्वर्ग पुनः प्राप्त किया। सृष्टि का संतुलन फिर से स्थापित हुआ। समुद्र मंथन पूर्ण हुआ— विष पहले आया, अमृत अंत में। “तो भक्तों, यही थी समुद्र मंथन की दिव्य कथा, जो हमें सिखाती है कि संघर्ष के बाद ही अमृत की प्राप्ति होती है। यदि आपको यह कथा पसंद आई हो, तो वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और सनातन धर्म की ऐसी ही दिव्य कथाओं के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। हर हर महादेव! जय श्री हरि!” #समुद्र_मंथन #SamudraManthan #HinduMythology #PauranikKatha #SanatanDharma #नीलकंठ #AmritKatha #VishnuPuran #BhagwatPuran #LordShiva #LordVishnu #MataLakshmi #MohiniAvtar