У нас вы можете посмотреть бесплатно 𝐀𝐚𝐤𝐡𝐢𝐫𝐢 𝐑𝐚𝐚𝐭 𝐇𝐚𝐢 | 𝐀𝐲𝐲𝐚𝐦𝐞 𝐅𝐚𝐭𝐢𝐦𝐚 𝟐𝟎𝟐𝟓-𝟏𝟒𝟒𝟕 | 𝐀𝐫𝐢𝐟 𝐑𝐚𝐯𝐢𝐬𝐡 𝐊𝐚𝐫𝐛𝐚𝐥𝐚𝐢 или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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Noha: Aakhiri Raat Hai Zehra Ki Ali Ke Ghar Main Reciter: Arif Ravish Karbalai Poet: Janab Nawab Chholasi Sahab Anjuman Haidry Regd.Sankhni Audio: AR.Studio video: AR.Studeo SUBSCRIBE: Arif Ravish Sankhnavi ©Arif Ravish #arifravish #azadarisankhni #moharram #newnoha #2025 #like #subscribe #support Lyrics :- वक़्ते आखिर हे मेरा फातिमा जहरा ने कहा आखिरी रात हे जहरा की अली के घर मैं बन के मां पालना बच्चों को मेरे ऐं फ़िज़्ज़ा आखिरी रात हे जहरा की अली के घर मैं 1_फ़िज़्ज़ा बच्चों का मेरे रखना हे अब तुमको ख्याल इनको होने नहीं देना कभी मां का भी मलाल प्यास से होता है सरवर मेरा रातों को निढाल शब में उठ उठ के किया करता हे पानी का सवाल बाद मेरे इसे तुम पानी पिलाती रहना आखिर रात हे ज़हरा की अली के घर में 2_आज के बाद ना इस घर में नज़र आऊंगी अपना घर छोड़ के तुझ पर में चली जाऊंगी रोते बच्चो को भला कैसे में बहलाऊंगी चैन से कब्र के अंदर भी ना रह पाऊंगी ध्यान रखना हे मेरे बाद मेरे बच्चों का आखिरी रात हे ज़हरा की अली के घर में 3_गिर गया मुझे पे ये जलता हुआ दर सब्र किया पसलियां टूट गई मेरी मगर सब्र किया पेराहन मेरा हुआ खून में तर सब्र किया ज़ुल्म ढाकर ये गाए बानी ए शर सब्र किया ये बताते हुवे फटता हे कलेजा मेरा आखिर रात हे ज़हरा की अली के घर में 4_हाय इस दौरे जवानी में ज़ाईफा में हूं है कहां चैन मुझे पहलू शिकस्ता में हूं पसलियां तोड़ दी जिसकी वो यतीमा में हूं हाले दिल सुन मेरा फ़िज़्ज़ा अभी जिंदा में हूं ऐसी हालत में ही फ़िज़्ज़ा मुझे आएगी क़ज़ा..... आखिरी रात हे ज़हरा की अली के घर में 5_रास 18वाँ आया ही नहीं सिन हाय कैसे रह पाएंगे हसनैन मेरे बिन हाय बिनते अहमद पे क़यामत के हैं ये दिन हाय मर गया मेरे शिकम में मेरा मोहसिन हाय दम निकल जाएगा होजाऊंगी कल तुझ से जुदा.... आखिरी रात हे ज़हरा की अली के घर में 6_सोई कुछ देर को जब आंखे हुई अश्कों से नम ये सुना अब ना सताएंगे मुझे अहले सितम मुझ से फरमाने लगे खुद ये रसूले अकरम पास बाबा के चली जाऊंगी खालिक़ की क़सम आगए ख्वाब में लेने को रसूले दो सरा आखिरी रात हे ज़हरा की अली के घर में 7_दिल हिलाता हे मेरा कार्बोबला का मंज़र कुंद खंजर से कटेगा मेरे शब्बीर का सर बेटियों के मेरी छिन जाएगी सर से चादर खाक उड़ाऊंगी सरे दशत बला में जाकर ये बताया हे तुझे कार्बोबला का क़िस्सा आखिरी रात हे ज़हरा की अली के घर में 8_दिल में तकलीफ जो ज़हरा के नवाब होने लगी दर्द जब ओर ज़्यादा हुआ जां खोने लगी हाल पर अपने ही खुद अश्कों से मुंह धोने लगी कह के फ़िज़्ज़ा से ये हसनैन की मां रोने लगी सुनके नोहा ये रविश हो गया महशर बरपा...... आखिरी रात हे ज़हरा की अली के घर में