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Zahra Ki Duwa Anjuman Aarfi Baghra Branch (Delhi)9911657406 Lyrics ज़ैहरा की दुआ है ये मजलिसो मातम रोके ना रूकेगा फतवों के सितम से अशकों का ये दर्या रोके ना रूकेगा छोड़ेगे ना हरग़िज इस ग़म को मनाना कितना भी मुख़ालिफ हो जाए ज़माना क़िसमत में लिखा है विर्से में मिला है ये ग़म ना छुटेगा मातम है साअदत मातम है इबादत ज़ैहरा का है वादा मातम की बदौलत हर एक अज़ादार साए में अलम के जन्नत में रहेगा ये बात सुनी है वलयों की जबानी देता है ये मातम बुड़ो को जवानी आएगी कभी भी उस पर ना ज़ईफी मातम जो करेगा देता है सदा ये किरदारे ख़ुमैनी साबित हो अमल से हम सब हैं हुसैनी ज़ालिम को बता दो कट जाएगा ये सर लेकिन ना झुकेगा अब्बास के बाज़ू ओ काटने वाले अब लाखो खाड़े है परचम को सम्भाले आ देख जहाँ में अब्बास का परचम घर घर से उठेगा ओ मुफ्तीये बिदअत है वकत सम्भल जा फ़िर रोज़े जज़ा तु पचताएगा वरना फरमाने नबी है शब्बीर का दुश्मन दोज़ख में जलेगा खाई है क़सम ये मुख्तार ने कह कर कुफे के सितमगर वो शाम का लश्कर छुप जाएं जहाँ भी शब्बीर के क़ातिल कोई ना बचेगा ख़ालिक की रिज़ा से जब आएंगे मेहदी हर सिमत जहाँ में छा जाएंगे मेहदी ये दिल को याकिं है फ़िर बिन्ते नबी का रोज़ा भी बनेगा मातम की सदा से दुनिया को हिला दो ज़ालिम को नवाज़ अब ये बात बता दो शब्बीर के ग़म को तुम रोकोगे जितना उतना ही बड़ेगा