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देश की प्रसिद्ध ध्रुपद गायिका असगरी बाई का जन्म बिजावर छतरपुर में 2 अगस्त 1918 को हुआ। छह वर्ष की आयु में वह अपने गुरु के साथ वह टीकमगढ़ आ गईं। बताया जाता है कि टीकमगढ़ महाराज वीरसिंह जूदेव नेअपने दरबार में गोहद निवासी उस्ताद जहूर खां से कहा था, कि उन्हें अपने राज्य में एक अद्वितीय गायिका चाहिए, जिससे दरबार में गायन परंपरा चलती रहे। उस्ताद जहूर खां को असगरी बाई का ख्याल आया। उन्होंने असगरी बाई को गोद लिया और गाना सिखाना शुरू कर किया। असगरी बाई 14-15 साल की उम्र में सारे रागों से परिचित हो चुकी थीं। उनकी माँ नज़ीर बेगम बिजावर के पूर्व शाही परिवार की एक गायिका थी, जबकि उनकी दादी बलायत बीबी अजयगढ़ रियासत के दरबार में गायिका थीं। एक बार वीरसिंह जूदेव के दरबार में सिद्धेश्वरी देवी अपना गायन प्रस्तुत कर रही थीं, उसी समय असगरी बाई उछल-उछल कर उन्हें देखना चाह रही थी। वीरसिंह जूदेव का ध्यान जब असगरी बाई की हरकत पर गया, तो उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और पूछा – किसकी बेटी हो? असगरी बाई ने उस्ताद जहूर खां की ओर इशारा करते हुए जवाब दिया कि मैं इनकी बेटी हूं। राजा को असगरी के गायन विद्या के बारे में और जाना था, सो उन्होंने पूछा कि यह क्या गा रही हैं? असगरी बाई ने जवाब दिया, यह तोड़ी गा रही हैं। किस राग में? भैरवी में।, राजा ने कहा क्या तुम गा सकती हो? असगरी ने तुरंत तोड़ी सुनाई। उन्होंने धमार और ध्रुपद भी गाया। राजा उनके गायन से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें टीकमगढ़ किले के राधा-माधव मंदिर में नौकरी दे दी। असगरी अपने गुरु उस्ताद जहूर खां के साथ घण्टों रियाज करती थीं, वहीं आगरा के एक कोयला व्यापारी चिमनलाल गुप्ता आया करते थे। दोनों एक-दूसरे के प्रति इतने आकर्षित हुए, कि 35 साल की उम्र में असगरी बाई ने उनसे गंधर्व विवाह कर लिया। असगरी बाई के पांच पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। उस समय ध्रुपद गायन केवल मंदिरों तक ही सीमित था । असगरी बाई ध्रुपद गायन में इतनी विशेषज्ञता हासिल कर ली थी कि उन्होंने अपनी भारी दमदार आवाज में ध्रुपद गायन को पहले राज दरबार, फिर सार्वजनिक मंच में पहचान दिलाई। असगरी बाई कुण्डेश्वर में पखावज के सिद्धहस्त ब्रह्चारी महाराज से मिलने जाया करती थीं। वहीं उनकी मुलाकात गुणसागर सत्यार्थी से हुई। वे असगरी बाई का गाना सुनकर इतने मुग्ध हो गए ,कि भोपाल आकर अलाउद्दीन खां संगीत अकादमी के तत्कालीन सचिव अशोक वाजपेयी से कहकर उनका नाम कलाकारों की सूची में शामिल करवा दिया। इसके बाद असगरी बाई को ससम्मान संगीत समारोहों में आमंत्रित किया जाने लगा। असगरी बाई ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की उपस्थिति में 84 बार ताल बदलकर ऐसा ध्रुपद गाया, कि उनके साथ पखावज पर संगत कर रहे बनारस के स्वामी पागलदास गायन खत्म होते ही मंच पर असगरी बाई के कदमों पर गिर पड़े। उन्होंने कहा, कि ऐसा गवैया आज तक हमने नहीं देखा। उस समय अर्जुन सिंह ने असगरी बाई को पांच हजार रुपए इनाम में दिए थे। उन्हें दिल्ली में हाईग्रेड गायक कलाकार का दर्जा भी मिली। उन्होंने सुर श्रृंगार मुबंई, संगीत-नाटक अकादमी दिल्ली, फैजाबाद, वृन्दावन, जयपुर, नांदेड, हैदराबाद, भुवनेश्वर के साथ ही देश के कई शहरों में प्रस्तुतियां दीं। उनकी प्रतिभा के सभी कायल थे। वे टीकमगढ़ राज दरबार में 35 साल तक रहीं । असगरी बाई मेवाती घराने से संबंध रखती थीं 1990 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ध्रुपद गायन के लिए पद्मश्री दिया गया जिनका वर्ष 2006 में इंतकाल हो गया।