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मानव जीवनमा पञ्चक्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) एउटै रहे पनि तिनको अभिव्यक्ति उमेरअनुसार फरक–फरक रूपमा प्रकट हुन्छ। बाल्यकालमा अविद्या र अस्मिता सरल आकांक्षा र निर्भरता रूपमा देखिन्छ; युवावस्थामा राग–द्वेष तीव्र भई पहिचान, उपलब्धि र सम्बन्धमा आसक्ति–प्रतिस्पर्धा बढ्छ; वृद्धावस्थामा अभिनिवेश (जीवन, स्वास्थ्य र गुम्ने डर) प्रधान भई परिवर्तनप्रतिको प्रतिरोध देखापर्छ। यसरी क्लेशहरू उमेरसँगै रूप बदल्दै गए पनि तिनको मूल जड अविद्या नै हो, र त्यसको क्षय क्रियायोग (तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान) द्वारा प्रत्येक अवस्थामै सम्भव हुन्छ।