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घर चाहता रोज बुहारना, क्यों नहीं चाहता मन को सवांरना झकझोर कभी मन को तो प्यारे , किस काज जगत में आया रे लख चौरासी भटक रहा था , प्रभु कृपा से नर तन पाया रे भुला दिया पथ प्रभु मिलन का, हां भुला दिया पथ प्रभु मिलन का क्या कभी चाहता है मन को दुत्कारना घर चाहता रोज बुहारना, क्यों नहीं चाहता मन को सवांरना दंभ है काया, शिक्षा का और, है पद का, धन, और वैभव का वाणी सुरीली कोमल का, चाहे नयन नशीले भैरव का चाहे वस्त्र, आभूषण गहने का , चाहे कोठी, बंगले रहने का सब्र करे, खुश रहे हर विधि सों,, हां सब्र करे, खुश रहे हर विधि सों क्या कभी चाहा मन को पुचकारना घर चाहता रोज बुहारना, क्यों नहीं चाहता मन को सवांरना नहीं किया भजन सुमिरन प्रभु का, मन लोलुपता विषय-व्यसन की सुख अपना चाहे पर देख और का, आग लगे मन तडपन की जान बूझ सब हुआ है पगला,, काहे जान बूझ सब हुआ है पगला क्यों नहीं चाहता मन को धिक्कारना घर चाहता रोज बुहारना, क्यों नहीं चाहता मन को सवांरना नहीं मिलना समय तोहे बैठ भजन का, भाई चलते फिरते ही अपनाले कर ले खाते पीते भी प्यारे, हर काज के संग मन से गा ले मन गांठ बांध ले संग कुछ ना चलेगा, हां मन गांठ बांध ले संग... बस एक नाम राम सिसकारना घर चाहता रोज बुहारना, क्यों नहीं चाहता मन को सवांरना क्यों नहीं चाहता है मन को दुत्कारना क्यों नहीं चाहता मन को धिक्कारना घर चाहता रोज बुहारना, क्यों नहीं चाहता मन को सवांरना हनुमान दास हरीश 91 72177 43932