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आचार्य श्री 108 विमल सागर जी महाराज का समाधि स्थल झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित श्री सम्मेद शिखरजी (मधुबन) में है। उन्होंने 29 दिसंबर 1994 को सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ) पर 12 वर्षों की संलेखना के बाद अपना देह त्याग किया था। मधुबन में उनका समाधि मंदिर एक पूज्यनीय वंदनीय स्थल के रूप में विख्यात है। समाधि स्थल की मुख्य बातें: स्थान: सम्मेद शिखरजी, मधुबन, झारखंड। समाधि तिथि: 29 दिसंबर 1994। विशेषता: यहाँ प्रतिवर्ष उनकी पुण्यतिथि पर विशेष धार्मिक आयोजन और सजावट की जाती है। वे दिगंबर जैन धर्म के महान संत थे और उनका समाधि स्थल जैन धर्मावलंबियों के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल है। पूर्व नाम-श्री नेमीचंद जी पिता-श्री बिहारी लाल जी माता-श्रीमती कटोरी देवी जी जन्म-आश्विन कृष्ण 7 सप्तमी 27 सितम्बर सन 1916 जन्म स्थान-कोसमा ऐटा उत्तर प्रदेश शिक्षा-मुरैना mp शास्त्री हिंदी संस्कृत प्राकृत यज्ञोपवीत संस्कार-प्रथमाचार्य चारित्र चक्र वति आचार्य श्री शांति सागर जी शुद्ध जल का नियम-आचार्य कल्प श्री चंद्र सागर जी से व्रत प्रतिमा-आचार्य श्री वीर सागर जी से 2 प्रतिमा और 7 प्रतिमा के नियम क्षुल्लक दीक्षा-आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी से श्री बावनगजा जी सिद्ध क्षेत्र बड़वानी mp में28 जून 1950 क्षुल्लक नाम-श्री वृषभ सागर जी आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी से आषाढ़ सुदी 5 विक्रम संवत 2007 सन 1950 ऐलक दीक्षा-धर्मपुरी में आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी से नाम श्री सुधर्म सागर जी 23 फरवरी 1951 माध सुदी 12 विक्रम संवत 2008 सन 1951 मुनि दीक्षा-सिद्ध क्षेत्र श्री सोनागिर जी आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी ने दी दिनांक 21 मार्च 1952 फागुन सुदी 13 विक्रम संवत 2009 सन 1952 आचार्य पद-टूडला Uttar Pradesh सन 1960 विक्रम संवत 2017 चातुर्मास विशेष जब आप माता के गर्भ में थे आ आपकी माताजी की श्री सोनागिर सिद्ध क्षेत्र दर्शन करने की भावना हुई और परिवार के साथ दर्शन किये तथा बालक का प्रथम मुंडन भी श्री सोनागिर क्षेत्र पर कराया यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि आपकी मुनि दीक्षा भी सोनागिर क्षेत्र में हुई तथा पुनः केशलोचन सोनागिर क्षेत्र में हुए परिवार का एक उल्लेखनीय प्रसंग है कि आचार्य श्री कि गृहस्थ अवस्था की दादी की जब शादी हुई तब परिवार कोसमा के पास तखावन ग्राम में रहते थे वहाँ जैन मंदिर नही था दादी का जिन दर्शन बगैर भोजन का नियम था 3 दिन हो गए नवीन दुल्हन ने भोजन नही किया सभी चिंतित थे क्या किया जावे दादी का पुण्य कहे या व्रत की महिमा एक आदमी बैलगाड़ी में 1008 श्री पार्श्व नाथ भगवान की प्रतिमा विक्रय के लिए लाया कीमत 11 ग्यारह रुपये उस जमाने मे 11 रुपये भी बड़ी कीमत रखते थे दादी ने 11 रुपये देकर प्रतिमा ली पूर्ण भक्ति भाव से पूजा आराधना कर 3 दिन बाद पारणा हुआ वह प्रतिमा आज भी उसी ग्राम तखावन में विराजित है प्रसंग आचार्य श्री विमल सागर जी एवम आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी सन 1964 में आचार्य श्री विमल सागर जी श्री बावनगजा जी विराजित थे साथ ही दीक्षा गुरु आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी भी विराजित थे तब गृहस्थ अवस्था के 14 वर्षीय श्री यशवंत जी ने आचार्य श्री विमल सागर जी के दर्शन किये तब निमित्त ज्ञानी आचार्य श्री विमल सागर जी ने आशीर्वाद दिया धर्म मार्ग पर आगे बढ़ो तथा आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी ने आशीर्वाद दिया कि वैराग्य मार्ग ही हितकर है किसे पता था कि 14 वर्षीय श्री यशवंत जी आगे चलकर वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी बनेंगे यही नही 18 वर्षीय श्री यशवंत जी ने आचार्य श्री विमल सागर जी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत भी अंगीकार किया Continue reading at https://digjainwiki.org/wiki/acharya-...| DigJainWiki