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मैं अपनी नानी के गाँव गई थी, और वहाँ का अनुभव अविस्मरणीय था। पूरे गाँव में पांडव नृत्य का आयोजन हो रहा था! ढोल और दमाऊं की गूंज के साथ, जो उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र हैं, कलाकार पांडवों के रूप में नृत्य कर रहे थे। यह सिर्फ एक नृत्य नहीं, बल्कि महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करने का एक तरीका था। गाँव के लोग बड़े उत्साह से इसमें शामिल थे। वे पांडवों के विशेष थाप पर अवतरित हो रहे थे, जिसे 'पांडव पश्वा' कहते हैं। यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि कैसे पूरा समुदाय एक साथ आता है, खासकर पहाड़ की बेटियाँ जो दूर रहती हैं, वे भी अपने मायके आती हैं और इस उत्सव का हिस्सा बनती हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और यह गाँव के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ती है।" पांडव नृत्य के बारे में कुछ और बातें: उत्तराखंड की धरोहर: पांडव नृत्य गढ़वाल क्षेत्र का एक खास लोकनृत्य है, जिसका पांडवों से गहरा संबंध है। पश्वा: ढोल-दमाऊं की विशेष थाप पर कुछ लोगों पर पांडव (जैसे युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन आदि) अवतरित होते हैं, जिन्हें पश्वा कहते हैं। गाँव वालों का जुड़ाव: यह पर्व गाँव के लोगों को एकजुट करता है और उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ता है।