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बारह भावना आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री 108 क्षमा सागर जी महाराज के प्रवचन अनित्य भावना कविश्री भूधरदास KaviSri Bhudharadasa ( अनित्य भावना ) ( anitya bhayana ) राजा राणा छत्रपति , हाथिन के असवार | मरना सबको एक दिन , अपनी - अपनी बार | | १ | | Raja rani chatrapati , hathina ke asavara | Marana sabako eka dina , apani - apani hara | | 1 | | अनित्य भावना - संसार की नश्वरता को देखते हुए मनुष्य यह चिन्तन - मनन करे कि इन्द्रियों के जितने भी विषय हैं , धन - दौलत , यौवन , भोग और शरीर - पर्याय आदि , ये सब जल के बुलबुले या इन्द्रधनुष की भाँति अस्थिर हैं । इस प्रकार का चिंतन अनित्य भावना है । अनित्य भावना के चिंतन से सांसारिक पदार्थों के प्रति मोह और आसक्ति कम होती है , जिससे मनुष्य इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोग में कभी दु : खी नहीं होता है । • 09. निर्जरा भावना मुनि श्री 108 क्षमा सागर...