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To Uttrakhand Me Kuchh Ish Tarah Celebrate Kiya Jata Hai Makar Sankranti #uttrakhand#phadilifestyle . . घुघुती त्योहार 2026 (Ghughuti Festival) उत्तराखंड, खासकर कुमाऊं क्षेत्र में मकर संक्रांति (14 जनवरी) के दिन मनाया जाता है, जो समृद्धि, प्रकृति से जुड़ाव और बच्चों के लिए खुशी का प्रतीक है, जहाँ आटे और गुड़ से बनी मिठाइयों (घुघुती) की माला बनाकर कौवों को खिलाई जाती है और यह त्यौहार राजा के बेटे को कौवे द्वारा बचाने की लोककथा से जुड़ा है। क्यों मनाया जाता है (Why it is celebrated): कौवे की कहानी (The Crow's Story): सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, कुमाऊं के राजा कल्याण चंद के बेटे 'घुघुती' को एक दुष्ट मंत्री मारना चाहता था, लेकिन एक कौवे ने राजा को इसकी सूचना दी और बेटे की जान बचाई। राजा के बेटे के नाम पर ही इस त्योहार का नाम 'घुघुती' पड़ा, और तब से कौवों को मीठी चीजें खिलाने की परंपरा शुरू हुई। प्रकृति और पक्षियों से जुड़ाव (Connection with Nature & Birds): यह त्योहार कड़ाके की सर्दी के बाद लौटने वाले पक्षियों का स्वागत करता है और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश देता है। यह बताता है कि मनुष्य, जानवर और प्रकृति एक-दूसरे पर निर्भर हैं। समृद्धि और खुशहाली (Prosperity & Happiness): घुघुती की माला बच्चों के गले में पहनाई जाती है और यह घर में खुशी, समृद्धि और सकारात्मकता लाने के लिए मनाई जाती है। मकर संक्रांति का उत्सव (Makar Sankranti Celebration): यह उत्तराखंड में मकर संक्रांति को मनाने का एक अनूठा तरीका है, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश (उत्तरायण) का प्रतीक है और लंबी सर्दियों के अंत का संकेत देता है। कैसे मनाते हैं (How it's celebrated): इस दिन आटे, गुड़ और तिल से बनी चिड़िया, मछली, डमरू जैसी आकृतियों की मिठाइयाँ (घुघुती) बनाई जाती हैं। इन मिठाइयों की माला बनाकर बच्चों के गले में पहनाई जाती है और वे कौवों को बुलाकर गाना गाते हैं, "काले का, काले का, घुघुती दे दे..." (कौवे को बुलाना) और उन्हें ये मिठाइयाँ खिलाते हैं। यह मुख्य रूप से कुमाऊं मंडल (अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर आदि) में मनाया जाता है, जबकि गढ़वाल में इसे मकर संक्रांति या खिचड़ी पर्व कहते हैं।