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इस गूढ़ प्रवचन में स्वामी श्री केशवानंद जी सरस्वती ने रामायण – बाल कांड के एक महत्वपूर्ण श्लोक की व्याख्या की है — “जो सपना सिर काटे कोई, बिनु जागे दुख दूर न होई।” गुरुदेव बताते हैं कि यह चौपाई केवल स्वप्न का वर्णन नहीं, बल्कि साधक की आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है। यह बताती है कि जब तक साधक अपने अहंकार (सिर) को नहीं त्यागता, तब तक उसकी साधना में जागरण संभव नहीं। “सिर काटना” यहाँ अहंभाव का अंत और “जागना” आत्मिक चेतना का उदय है। गुरुदेव आगे समझाते हैं कि बाल कांड साधक की साधना की प्रारंभिक अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है — जहाँ साधक अपने भीतर के संस्कारों, स्वप्नों और प्रतीकों को समझना शुरू करता है। जैसे बाल्यावस्था में सीखना सहज होता है, वैसे ही साधना की शुरुआत भी निर्मलता और जिज्ञासा से होती है। यह प्रवचन बताता है कि रामायण केवल कथा नहीं, बल्कि हर साधक के भीतर घटती एक दिव्य यात्रा है। इस अद्भुत प्रवचन को अवश्य सुनें और अपने प्रियजनों के साथ साझा करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और ऐसे ही आध्यात्मिक संदेशों के लिए बेल आइकन दबाएं। #KeshavanandJi #ramayankatha #ramayan #sadhna #adhyatma #bhakti #spiritualwisdom #vrindavan