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ब्रह्मलीन सन्त भेरौदास जी महाराज : त्याग, तप और सर्वधर्म समभाव के जीवंत प्रतीक भारतीय संत परंपरा में कुछ विभूतियाँ ऐसी होती हैं जिनका जीवन स्वयं एक ग्रंथ बन जाता है। ब्रह्मलीन सन्त भेरौदास जी महाराज भी ऐसे ही एक महान संत थे, जिनका सम्पूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और नित्य भजन में लीन रहकर लोककल्याण के लिए समर्पित रहा। त्याग और तपस्या का जीवन सन्त भेरौदास जी महाराज ने सांसारिक मोह-माया से स्वयं को दूर रखते हुए एक साधक का जीवन अपनाया। उनका अधिकांश समय जप, तप, ध्यान और प्रभु स्मरण में व्यतीत होता था। वे दिखावे की साधना में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और आत्मबोध में विश्वास रखते थे। नित्य राम नाम का स्मरण, भजन-कीर्तन और साधना उनके जीवन का आधार था। उनका विशेष गुण : संगीत और बांसुरी की दिव्य धुन ब्रह्मलीन सन्त भेरौदास जी महाराज के व्यक्तित्व का एक अत्यंत विलक्षण और आकर्षक गुण था — संगीत साधना और बांसुरी की मधुर धुन। उनके लिए संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ईश्वर से संवाद का माध्यम था। जब महाराज जी बांसुरी हाथ में लेते, तो ऐसा प्रतीत होता मानो वातावरण स्वयं शांत होकर ध्यान में लीन हो गया हो। उनकी बांसुरी की धुन में भक्ति की गहराई थी करुणा की मिठास थी और आत्मा को छू लेने वाली दिव्यता थी कई बार बिना शब्दों के ही उनकी बांसुरी वह संदेश दे जाती थी, जो लंबे उपदेश भी नहीं दे पाते। आश्रम में उपस्थित साधक, शिष्य और श्रद्धालु उस धुन को सुनकर सहज ही ध्यानावस्था में चले जाते थे। ऐसा अनुभव होता था मानो भगवान श्रीकृष्ण की बंसी की झलक उस धुन में समाहित हो। उनकी संगीत साधना यह सिखाती है कि जब साधक का हृदय शुद्ध हो, तब स्वर भी साधना बन जाते हैं। ब्रह्मलीन होने के पश्चात भी श्रद्धालु आज तक अनुभव करते हैं कि शांत वातावरण में, विशेषकर भजन-कीर्तन के समय, उनकी बांसुरी की वही दिव्य अनुभूति मानो आज भी आश्रम में गूंज रही हो। सन्त भेरौदास जी महाराज का संगीत — आत्मा को ईश्वर से जोड़ने वाली अमर साधना। 🎶 भैरव दास महाराज : करह धाम सम्प्रदाय की सिद्ध गुरु-परंपरा के तेजस्वी संत ब्रह्मलीन भैरव दास महाराज करह धाम सम्प्रदाय से जुड़े हुए ऐसे सिद्ध संत थे, जिनकी साधना की जड़ें एक अत्यंत प्राचीन, तपस्वी और अनुभूतिपूर्ण गुरु-परंपरा से जुड़ी थीं। यह वही करह धाम सम्प्रदाय है, जिसकी आध्यात्मिक धारा में माधव दास महाराज, लखन दास महाराज और पटिया वाले बाबा जैसे महान सिद्ध संतों का दिव्य योगदान रहा है। सिद्ध संतों की गुरु-परंपरा करह धाम सम्प्रदाय की यह परंपरा केवल नाम या वंश की नहीं, बल्कि अनुभव, साधना और सिद्धि की परंपरा मानी जाती है। माधव दास महाराज ने जिस मार्ग को साधना, वैराग्य और नाम-स्मरण से प्रकाशित किया, उसे आगे लखन दास महाराज ने तप, मौन और करुणा से पुष्ट किया। पटिया वाले बाबा ने इस परंपरा को जन-जन तक पहुँचाकर सिद्ध संत की पहचान स्थापित की। भैरव दास महाराज इसी दिव्य श्रृंखला के ऐसे संत थे, जिनमें इन सभी सिद्धों की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी— तप में स्थिरता भक्ति में माधुर्य और सेवा में निःस्वार्थ भाव साधना, संगीत और अनुभूति करह धाम सम्प्रदाय की विशेष पहचान रही है—नाम के साथ स्वर की साधना। भैरव दास महाराज की बांसुरी और संगीत साधना इसी परंपरा का जीवंत प्रमाण थी। उनकी बांसुरी की धुन केवल मधुर स्वर नहीं, बल्कि गुरु-परंपरा की संचित साधना की अनुभूति थी, जो श्रोता के हृदय को भीतर तक स्पर्श कर जाती थी। परंपरा को जीवित रखने वाले संत खेरे वाले हनुमान जी, सतनबाड़ा आश्रम में होने वाले अखण्ड रामधुन, यज्ञ, कीर्तन और भंडारे केवल आयोजन नहीं थे, बल्कि करह धाम सम्प्रदाय की गुरु-परंपरा को जीवित रखने का माध्यम थे। लाखों श्रद्धालुओं का स्वतः जुड़ना इस बात का प्रमाण है कि भैरव दास महाराज केवल उपदेशक नहीं, अनुभूत गुरु थे। आज भी जीवंत गुरु-कृपा भैरव दास महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात भी उनके शिष्य अनुभव करते हैं कि गुरु-परंपरा की कृपा आज भी आश्रम में प्रवाहित हो रही है। यह करह धाम सम्प्रदाय की विशेषता है कि गुरु देह से नहीं, चेतना से शिष्य को दिशा देते हैं। ऐसे सिद्ध संत, जो माधव दास महाराज से लेकर पटिया वाले बाबा तक की गुरु-परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, युगों तक स्मरण किए जाते हैं। 🙏 जय श्री राम 🙏 सर्वधर्म समभाव की अनुपम मिसाल महाराज जी की सबसे बड़ी विशेषता उनका सर्वधर्म समभाव था। उन्होंने न केवल मंदिरों में रहकर सेवा की, बल्कि अनेक मस्जिदों में भी निवास कर उनके जीर्णोद्धार और सेवा कार्यों में सहयोग किया। उनके लिए ईश्वर किसी एक धर्म या संप्रदाय में सीमित नहीं था, बल्कि मानवता ही उनका सबसे बड़ा धर्म था। यही कारण है कि उनके अनुयायियों में हर वर्ग और हर समुदाय के लोग सम्मिलित थे। शिष्य परंपरा और जनकल्याण सन्त भेरौदास जी महाराज के असंख्य शिष्य और अनुयायी रहे, जिन्होंने उनके विचारों और आदर्शों को अपने जीवन में अपनाया। वे केवल उपदेश देने वाले संत नहीं थे, बल्कि अपने आचरण से शिक्षा देने वाले महापुरुष थे। सेवा, सद्भाव, प्रेम और भक्ति का संदेश उन्होंने अपने जीवन से जन-जन तक पहुँचाया। खेरे वाले हनुमान जी, सतनबाड़ा आश्रम और महायज्ञ परंपरा #yagya #aashram #karahdham #ramnamyagya #bhajan #sant #bansuri #2026yagya #bhajanmarg