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दुख एक अवसर है या सजा? ईशावास्य उपनिषद की दृष्टि क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों एक ईमानदार इंसान मुश्किलों से घिरा रहता है, जबकि एक बेईमान व्यक्ति सफलता का आनंद लेता है? यह वीडियो ईशावास्य उपनिषद के गूढ़ सिद्धांतों के माध्यम से इस जटिल सवाल की पड़ताल करता है। इस वीडियो में आप जानेंगे: • जीवन एक डिजाइन की गई परीक्षा है: उपनिषद के अनुसार, परमात्मा जिन्हें 'परिभू' (सब पर शासन करने वाला) कहा गया है, वे हर जीव के लिए उसके कर्मों के अनुसार 'यथातथ्यता' यानी बिल्कुल सटीक हालात बनाते हैं। सुख और दुख दोनों ही आत्मा को परखने के साधन हैं। • दुख: एक कड़वी दवा और अलार्म: कष्ट की परीक्षा सीधी और प्रत्यक्ष होती है। यह एक 'अलार्म' की तरह काम करती है जो हमें आध्यात्मिक नींद से जगाती है और आत्म-मंथन के लिए मजबूर करती है। शारीरिक पीड़ा के बीच उस 'अकायम' (बिना शरीर वाले) और 'शुद्धम' (पवित्र) परमात्मा पर ध्यान केंद्रित करना एक कठिन लेकिन महान चुनौती है। • सफलता: एक मीठा ज़हर और लोरी: सफलता अक्सर दुख से कहीं अधिक खतरनाक परीक्षा साबित होती है। यह एक 'लोरी' की तरह है जो इंसान को आध्यात्मिक रूप से 'कोमा' में ले जा सकती है। सफलता का अहंकार व्यक्ति को यह भुला देता है कि परमात्मा 'कवि' (सब कुछ देखने वाले) और 'मनीषी' (मन की बात जानने वाले) हैं, जो बंद दरवाजों के पीछे के कर्मों को भी देख रहे हैं। • सूरज और पत्थर का उदाहरण: जैसे सूर्य की रोशनी एक पत्थर को और कठोर बना देती है लेकिन एक कली को फूल बना देती है, वैसे ही सफलता एक अहंकारी व्यक्ति के अहंकार को और कड़ा कर देती है, जबकि एक विनम्र व्यक्ति को और विकसित करती है। • आध्यात्मिक सफलता का असली पैमाना: आध्यात्मिक प्रगति को बाहरी धन या पद से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि, निष्पक्षता और शिकायत की भावना के पूर्ण नाश से मापा जाता है। यह चर्चा हमें अपनी मौजूदा स्थिति को एक नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती है—क्या आपका मौजूदा हालात आपको जगाने के लिए एक 'कड़वी दवा' है या आपको सुलाने वाला एक 'मीठा ज़हर'?