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Jawaharlal Nehru University (JNU) की वाइस चांसलर के कथित बयान — “Dalits are drugged to permanent victimhood” — पर सियासी और शैक्षणिक हलकों में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे पर Dr Kanchana Yadav ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाए कि क्या दलित, पिछड़े और आदिवासी छात्रों की वास्तविक समस्याओं को “विक्टिमहुड” कहकर खारिज किया जा सकता है? उन्होंने पूछा कि क्या Rohith Vemula और Payal Tadvi जैसे मामलों को भी इसी नजरिए से देखा जाएगा? डॉ यादव ने आरोप लगाया कि VC की भाषा RSS और BJP की विचारधारा से मेल खाती है और UGC नियमों के विरोध को लेकर भी एक सुनियोजित नैरेटिव खड़ा किया गया। उन्होंने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि दलित-पिछड़े-आदिवासी प्रतिनिधित्व का मुद्दा दबाया जा रहा है। IIT, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों में प्रतिनिधित्व, NFS पदों का खाली रहना, आरक्षण का वास्तविक लाभ, और विश्वविद्यालयों में बढ़ती वैचारिक ध्रुवीकरण—इन सभी सवालों पर यह चर्चा केंद्रित है। क्या यह केवल एक बयान का विवाद है या देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में गहरे बैठे सामाजिक पूर्वाग्रहों का आईना? क्या आरक्षण पर बहस प्रतिनिधित्व की है या राजनीति की? पूरी चर्चा देखिए और अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए। ⸻ #JNU #JNUVC #DalitIssue #ReservationDebate #UGCControversy #KanchanaYadav #SocialJustice #CasteDebate #IndianPolitics #HigherEducation #RepresentationMatters #CampusPolitics #vikrantyadav #theswatantra #vikrantswatantra