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कित्तूर रानी चन्नम्मा भारत का इतिहास कई ऐसी वीरांगनाओं के पराक्रम का साक्षी है, जिनकी वीरता की कहानियाँ विश्व इतिहास में दर्ज हैं। ऐसी ही एक वीरांगना थीं कित्तूर की रानी चन्नम्मा। रानी चन्नम्मा उन चुनिंदा भारतीय शासकों में हैं, जिन्होंने अंग्रेजों को बुरी तरह हराया था। 19 वीं शताब्दी की शुरुआत में जब बहुत से शासक अंग्रेजों के बुरे इरादों से परिचित नहीं थे, तब रानी चन्नम्मा ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी थी। 1857 के विद्रोह से 33 वर्ष पहले एक महिला द्वारा किया गया यह संघर्ष वास्तव में भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम की गाथा का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। चन्नम्मा कन्नड़, संस्कृत, मराठी और उर्दू भाषाएं जानती थीं और साथ ही वह एक प्रतिभाशाली योद्धा थीं। 23 अक्टूबर, 1778 को जन्मी काकती की चन्नम्मा से कित्तूर की रानी बनने से पहले एक बालिका के रूप में भी अपनी बहादुरी के लिए जानी जाती थीं। कम उम्र में ही उन्होंने उस समय की मार्शल आर्ट के महत्वपूर्ण हिस्से जैसे घोड़े की सवारी करना, तलवार चलाना और तीरंदाजी सीख ली थी। बेलगाम जिले के छोटे से गांव काकती में धुळप्पा और पद्मावती के घर जन्मी बेटी की बाद में कित्तूर के राजा मल्लसर्ज देसाई से शादी हुई और वह रानी चन्नम्मा बन गईं| चन्नम्मा से विवाह करने से पहले मल्लसर्ज का पहला विवाह रुद्रम्मा से हुआ था। विवाह के बाद चन्नम्मा को एक बेटा हुआ लेकिन कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई। पुत्र की मृत्यु के कुछ समय बाद ही राजा मल्लसर्ज की भी मृत्यु हो गई। पुत्र और पति की मृत्यु के बाद चन्नम्मा ने हार नहीं मानी। नियमानुसार गोद लिया गए अपने संस्थान परिवार से संबंधित शिवलिंगप्पा को राजगद्दी पर बिठाकर संस्थान का शासन करने लगीं, परंतु अंग्रेजों ने शिवलिंगप्पा को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया। अंग्रेजों को कित्तूर राज्य हड़पने का लंबे समय से वांछित अवसर मिल गया। उनकी एक मनमानी हड़प नीति थी (The dotrine of lapse) जिसके अनुसार कोई प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी न होने पर राज्य छीन लिए जाते थे। अंग्रेजों ने कित्तूर पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। रानी ने बॉम्बे प्रेसिडेंसी के लेफ्टनंट गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन को एक पत्र भेज कर इसका विरोध किया, पर रानी के आग्रह को अंग्रेजों ने ठुकरा दिया और युद्ध छिड़ गया। अंग्रेजों की नजर तो कित्तूर के खजाने पर थी जो उस वक्त ही तकरीबन 15 लाख रुपये का था। अंग्रेजों ने मद्रास नेटिव हॉर्स आर्टिलरी की तीसरी टुकड़ी के 20,000 सिपाहियों और 400 बंदूकों के साथ कित्तूर पर आक्रमण किया। अक्टूबर 1824 में लड़ाई हुई। उस वक्त कित्तूर की फौज अंग्रेजों के सामने कुछ भी नहीं थी, लेकिन उनके पास था उस वीरांगना का हौसला जिसने अकेले ही अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बजा रखा था। रानी चन्नम्मा ने अपनी सेना के साथ ऐसा रणकौशल दिखाया कि अंग्रेज चारों खाने चित्त हो गए। लड़ाई में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। 23 अक्टूबर 1824 को युद्ध में धारवाड़ का तत्कालीन कलेक्टर और अंग्रेजों का पोलिटिकल एजेंट सेंट जॉन थैकरे (St. John Thackeray) मारा गया। रानी चन्नम्मा के सहयोगी अमतुर बाळप्पा ने उसे मार गिराया। ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान पहुँचा। दो ब्रिटिश अधिकारी वॉल्टर एलियट और स्टीवेंसन को बंधक बना लिया गया। अंग्रेजों ने वादा किया कि अब युद्ध नहीं करेंगे, तो रानी ने ब्रिटिश अधिकारियों को रिहा कर दिया। लेकिन अंग्रेजों ने धोखा दिया और डेढ़ महीने बाद फिर से युद्ध छेड़ दिया। इस बार ब्रिटिश अफसर चैपलिन (Mr. Chaplin) ने पहले से भी ज्यादा सिपाहियों के साथ हमला किया। रानी अपने सेनापति वीर संगोळी रायन्ना और गुरु सिद्दप्पा के साथ जोरदार तरीके से लड़ीं, परंतु अंग्रेजों के मुकाबले कम सैनिक होने के कारन कित्तूर की सेना हार गई। किले में अंग्रेजों ने जो लूटपाट की उनमें 16 लाख रुपये नकद और 4 लाख के गहने, कई घोड़े, एक हजार ऊंट, कई हाथी, कई बंदूकें, तलवारें शामिल थी। 3 दिसंबर 1824 को रानी को कैद किया गया। कित्तूर संस्थान को बेलगाम जिले में मिला लिया गया और रानी को बैलहोंगल के किले में युद्धबंदी बनाकर रखा गया। इसके बाद भी रानी के बहाद्दुर सेनापति संगोळी रायन्ना अंग्रेज़ों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ते रहे। उनकी छापामार सेना अचानक ब्रिटिश सेना पर हमला करती, सरकारी दफ्तरों में आग लगा देती, खजाना लूटती और स्थानीय लोगों की मदद करती। कित्तूर संस्थान को फिर से आज़ाद करने का और शिवलिंगप्पा को राजगद्दी पर बिठाने का प्रयास संगोळी रायन्ना करते रहे। अंग्रेज प्रत्यक्ष युद्ध में संगोळी रायन्ना को पराजित नहीं कर सके, तब धोखे से, कुछ गद्दारों का साथ लेकर पकड़ लिया और खानापुर तालुका के नंदगड में बरगद के पेड़ से लटका कर फाँसी दे दी गई। रायन्ना की समाधि नंदगड़ में स्थित है। उनकी स्मृति में कर्नाटक की राजधानी बेंगळुरू के रेल स्थानक का नामकरण क्रांतिवीर संगोळी रायन्ना रेल स्थानक के नाम से किया गया है। बैलहोंगल के किले में 21 फरवरी 1829 को रानी चन्नम्मा की मृत्यु हो गई। कित्तूर किला आज भी रानी चन्नम्मा, सेनापति वीर संगोळी रायन्ना और अमतुर बाळप्पा जैसे अन्य वीरों के पराक्रम का साक्षी है। अंग्रेजों के खिलाफ रानी के तेवर ही 1857 में हुए स्वतंत्रता संग्राम की पहली कड़ी माने जाते हैं। अपने अधिकारों के लिए, अपने लोगों के लिए लड़ने वाली रानी चन्नम्मा न केवल कर्नाटक के लिए बल्कि देश के लिए वीरता की एक मिसाल थीं। रानी की पहली जीत और उनकी विरासत को कित्तूर में हर वर्ष 22-24 अक्टूबर तक आयोजित कित्तूर उत्सव के दौरान याद किया जाता है। देश के लिए रानी चन्नम्मा के योगदान को याद करते हुए 1977 में भारत सरकार ने उनका डाक टिकट भी जारी किया। 11 सितम्बर 2007 को देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभाताई पाटील ने संसद भवन के प्रांगण में रानी चन्नम्मा की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया। डॉ. राजेंद्र पोवार 0000