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Radhaswamy Dayal Ki Daya Radhaswamy Sahay यह कीर्तन राधास्वामी मत की सबसे गहन आध्यात्मिक साधना 'सुरत शब्द योग' (आत्मा को आंतरिक नाद से जोड़ना) के बारे में बताता है। यहाँ बताया गया है कि आत्मा कैसे शरीर के बंधनों को तोड़कर उच्च लोकों में जाती है। पल्लवी (Refrain) कोई जतन करो सुरत गगन चढ़े। अर्थ: कोई ऐसा उपाय करो कि मेरी सुरत (चेतना/आत्मा) गगन (आंतरिक आध्यात्मिक लोकों) के शिखर पर चढ़ जाए। विशेषता: यहाँ 'गगन' का अर्थ बाहरी आकाश नहीं, बल्कि हमारे भीतर स्थित उच्चतम आध्यात्मिक केंद्र है। साधक की यह तड़प है कि उसकी आत्मा उच्चतम अवस्था को प्राप्त करे। प्रथम चरण पिंड छोड़ जावे ब्रह्मांडा, पहुँचे गुरु दरबारा। धुन मृदंग की कान में ओवे, ओंकार झनकारी॥ अर्थ: इस भौतिक शरीर (पिंड) से ध्यान हटाकर ब्रह्मांड लोक में प्रवेश करना है और गुरु के दरबार तक पहुँचना है। वहाँ कानों में मृदंग जैसी धुन सुनाई देती है और ओंकार की झंकार गूँजती है। विशेषता: योग साधना में जब शरीर को भुलाकर सूक्ष्म लोकों में प्रवेश होता है, तो 'अनाहत नाद' (बिना किसी वाद्य के स्वतः उत्पन्न ध्वनि) सुनाई देती है। यह आध्यात्मिक प्रगति का संकेत है। द्वितीय चरण सुन्न शिखर चढ़ आसन मारे, सहज समाध रचावे। मानसरोवर करे अशनाना, हंस की पदवी पावे॥ अर्थ: 'सुन्न शिखर' (शून्य की चोटी/निर्वाण स्थिति) पर पहुँचकर स्थिर आसन में बैठना है और सहज समाधि की अवस्था प्राप्त करनी है। वहाँ 'मानसरोवर' (आध्यात्मिक पवित्र सरोवर) में स्नान करके जीवात्मा 'हंस' (पवित्र आत्मा/परमहंस) की पदवी पाती है। विशेषता: आंतरिक शुद्धि के माध्यम से आत्मा अपनी सभी अशुद्धियों को धो डालती है और परम पवित्र 'हंस' (वह पक्षी जो दूध और पानी को अलग कर सकता है - सत्-असत् का विवेक रखने वाली आत्मा) बन जाती है। तृतीय चरण भँवर गुफा की खिड़की निरखे, सोहंग सोहंग भाखें। सत धाम में बीन बजावे, सत सत सत सत आखे॥ अर्थ: 'भंवर गुफा' (आध्यात्मिक यात्रा में एक उच्च लोक) की खिड़की से देखते हुए 'सोहं सोहं' (मैं वही हूँ/मैं ब्रह्म हूँ) का जाप करना है। सत्लोक (सत्य का धाम/परम धाम) में पहुँचकर वहाँ वीणा का नाद सुनते हुए 'सत सत सत' (सत्य ही सत्य) का उच्चारण करना है। विशेषता: यह आत्मा की यात्रा में मिलने वाले विभिन्न लोकों और वहाँ सुनाई देने वाले दिव्य नादों का वर्णन है। हर लोक में अलग प्रकार की दिव्य ध्वनि होती है। चतुर्थ चरण अलख को लख गम अगम की पावे, राधास्वामी पद में बासा। आस गुरु की चित में धारे, जग से रहे उदासा॥ अर्थ: जो आँखों से न दिखे (अलख), मन-बुद्धि की पहुँच से परे हो (अगम), उस लोक को प्राप्त करके अंततः 'राधास्वामी' के चरणों में निवास करना है। केवल गुरु पर ही आशा रखते हुए, इस बाहरी संसार से विरक्त (उदासीन) रहना है। विशेषता: अंतिम लक्ष्य राधास्वामी पद (परम पद/सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था) है, और उस तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग गुरु भक्ति है। पंचम चरण एक जनम में गुरु की सेवा, दूजे नाम का साधन। तीजे मुक्ति के धाम बसेरा, चौथे रूप अराधन॥ अर्थ: पहले जन्म में गुरु की सेवा करनी है, दूसरे जन्म में नाम (दिव्य नाम/शब्द) का साधन करना है, तीसरे जन्म में मुक्ति के धाम में निवास मिलता है, और चौथे जन्म में भगवान के स्वरूप की आराधना होती है - इस प्रकार क्रमशः उच्च अवस्थाओं को प्राप्त करना है। विशेषता: आध्यात्मिक विकास एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है, जिसकी नींव गुरु सेवा है। यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक प्रगति चरणबद्ध होती है। षष्ठ चरण राधास्वामी गुरु की दया भई है, शब्द योग को साधा। एक जनम में काम बनाया, मेटा सकल उपाधा॥ अर्थ: राधास्वामी गुरु की कृपा से 'शब्द योग' को साधने से, इस एक ही जन्म में मेरा काम बन गया (मोक्ष मिल गया)। मेरे सभी क्लेश, बंधन और उपाधियाँ (मन के सभी विकार) मिट गए। विशेषता: सामान्यतः अनेक जन्मों में मिलने वाली मोक्ष की प्राप्ति, गुरु की कृपा होने पर इसी जन्म में संभव हो जाती है - यह भक्त का गहरा विश्वास है। सारांश यह कीर्तन सुरत शब्द योग की पूरी यात्रा का मानचित्र है - पिंड (भौतिक शरीर) से लेकर राधास्वामी पद (परम धाम) तक। गुरु की कृपा और शब्द योग के माध्यम से इस जन्म में ही मुक्ति संभव है।