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वेदसार शिव स्तवम् एक प्रसिद्ध स्तोत्र है, जो भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है।वेदसारशिवस्तव: स्तोत्र यह आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित है। यह स्तोत्र भगवान शिव की स्तुति में अत्यंत प्रभावशाली और कल्याणकारी माना जाता है।भगवान शिव की पूजा में मंत्रों के जाप, तपस्या और व्रत का बहुत महत्व है।इसे साक्षात भगवान शंकर द्वारा दिया गया सुख का मंत्र भी माना जाता है, जो कि वेदसार स्तव के नाम से प्रसिद्ध है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित वेदसार शिव स्तव (Vedsar Shiv Stav) भगवान शिव की स्तुति का अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है, जो जीवन में सकारात्मकता, मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और शत्रुओं पर विजय दिलाता है। इसे नियमित पढ़ने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है और आध्यात्मिक विकास होता है, जिससे मन प्रसन्न रहता है। वेदसार शिव स्तव के प्रमुख लाभ (Benefits in Hindi): मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा: इस स्तोत्र का पाठ करने से मन से भय और नकारात्मकता दूर होती है और आंतरिक शांति का अनुभव होता है। बाधाओं और दुखों का नाश: जीवन में आ रही हर तरह की समस्याओं, बाधाओं और कष्टों का नाश होता है। शत्रुओं पर विजय: मान्यता है कि इसके पाठ से शत्रुओं पर जीत हासिल होती है और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं। रोगों से मुक्ति: लंबे समय से चली आ रही बीमारियों और शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। सुख-समृद्धि और ज्ञान: घर में धन, सुख-शांति का आगमन होता है और आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है। मनचाहा वरदान: नियमित पाठ से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएं पूरी करते हैं। Search Bhajans शिव स्तुति | वेदसार शिव स्तोत्रम Shiv Stuti | Vedasara Shiv Stotram पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्। जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्। महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्। विरूपाक्षमिन्द्वर्क- वह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्। गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्। भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्। शिवाकान्त शम्भो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन्। त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपः प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप। परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्। यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्। न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायु- र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा। न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे। अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्। तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्। नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते। नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य। प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र। शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः। शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्। काशीपते करुणया जगदेतदेक- स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि। त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ। त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन्। paśūnāṃ patiṃ pāpanāśaṃ pareśaṃ gajendrasya kṛttiṃ vasānaṃ vareṇyam | jaṭājūṭamadhye sphuradgāṅgavāriṃ mahādevamekaṃ smarāmi smarārim || 1 || maheśaṃ sureśaṃ surārārtināśaṃ vibhuṃ viśvanāthaṃ vibhūtyaṅgabhūṣam | virūpākṣamindvarka vahnitrinetraṃ sadānandamīḍe prabhuṃ pañcavaktram || 2 || girīśaṃ gaṇeśaṃ gale nīlavarṇaṃ gavendrādhirūḍhaṃ gaṇātītarūpam | bhavaṃ bhāsvaraṃ bhasmanā bhūṣitāṅgaṃ bhavānīkalatraṃ bhaje pañcavaktram|| 3 || śivākānta śambho śaśāṅkārdhamaule maheśāna śūlin jaṭājūṭadhārin | tvameko jagadvyāpako viśvarūpa prasīda prasīda prabho pūrṇarūpa || 4 || parātmānamekaṃ jagadvījamādyaṃ nirīhaṃ nirākāramoṅkāravedyam | yato jāyate pālyate yena viśvaṃ tamīśaṃ bhaje līyate yatra viśvam || 5 || na bhūmirna cāpo na vahnirna vāyur na cākāśa āste na tandrā na nidrā | na grīṣmo na śīto na deśo na veṣo na yasyāsti mūrtistrimūrti tamīḍe || 6 || ajaṃ śāśvataṃ kāraṇaṃ kāraṇānāṃ śivaṃ kevalaṃ bhāsakaṃ bhāsakānām | turīyaṃ tamaḥpāramādyantahīnaṃ prapadye paraṃ pāvanaṃ dvaitahīnam || 7 || namaste namaste vibho viśvamūrte namaste namaste cidānandamūrte | namaste namaste tapoyogagamya namaste namaste śrutijñānagamya || 8 || prabho śūlapāṇe vibho viśvanātha mahādeva śambho maheśa trinetra | śivākānta śānta smarāre purāre tvadanyo vareṇyo na mānyo na gaṇyaḥ || 9 || śambho maheśa karuṇāmaya śūlapāṇe gaurīpate paśupate paśupāśanāśin | kāśīpate karuṇayā jagadetadekas _ tvaṃ haṃsi pāsi vidadhāsi maheśvaro’si || 10 || tvatto jagadbhavati deva bhava smarāre tvayyeva tiṣṭhati jaganmṛḍa viśvanātha | tvayyeva gacchati layaṃ jagadetadīśa liṅgātmakaṃ hara carācaraviśvarūpin || 11 ||