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क्यों कृष्ण को जरासंध से युद्ध छोड़ कर भागना पड़ा ? #premanandjimaharaj #katha #krishna #krishnaleela #premanandjipravachan #satsang #pravachan #premanand #premanandji #spiritual कंस के वध के बाद, उसका ससुर और मगध का राजा 'जरासन्ध' क्रोधित हो जाता है। वह अपनी 23 अक्षौहिणी (Akshauhini) सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण कर देता है। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी पल भर में उसकी विशाल सेना का संहार कर देते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण बलराम जी को रोक देते हैं और जरासन्ध को जीवित छोड़ देते हैं, ताकि वह बार-बार दुष्टों की सेना लेकर आए और भगवान पृथ्वी का भार हल्का कर सकें। ऐसा एक-दो बार नहीं, बल्कि जरासन्ध ने कुल 17 बार 23 अक्षौहिणी सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया, और हर बार भगवान ने उसकी सेना का विनाश करके उसे जीवित जाने दिया। जब जरासन्ध 18वीं बार आक्रमण की तैयारी कर रहा होता है, उसी समय कालयवन नाम का एक म्लेच्छ योद्धा अपनी 3 करोड़ की सेना के साथ मथुरा को घेर लेता है। मथुरावासियों को इस दोहरे संकट से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण समुद्र के भीतर अपनी योगमाया से द्वारकापुरी का निर्माण करते हैं और रातों-रात सभी मथुरावासियों को सुरक्षित वहाँ पहुँचा देते हैं। इसके बाद, भगवान श्रीकृष्ण कालयवन के सामने से युद्ध छोड़कर भाग जाते हैं। युद्ध के मैदान से इस तरह भागने के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम "रणछोड़" पड़ा। यह उनकी एक लीला थी जिसका उद्देश्य ब्राह्मणों के अनुष्ठान की लाज रखना और कालयवन का अंत करना था। श्रीमद्भागवत कथा का प्रसंग शुरू होता है। जब मगधराज जरासंध 18वीं बार 23 अक्षौहिणी सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण करने आ रहा था, तभी देवर्षि नारद की प्रेरणा से 'कालयवन' नामक महाबली म्लेच्छ योद्धा अपनी 3 करोड़ सेना के साथ मथुरा को घेर लेता है। दोहरे संकट को देखते हुए भगवान श्रीकृष्ण समुद्र के बीच 'द्वारकापुरी' का निर्माण करवाते हैं और अपनी योगमाया से सभी मथुरावासियों को सुरक्षित वहाँ पहुँचा देते हैं। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण बिना अस्त्र-शस्त्र के मथुरा के मुख्य द्वार से निकलते हैं। कालयवन उन्हें पहचान कर उनके पीछे भागता है। भगवान युद्ध करने के बजाय रणभूमि से भागने का नाटक करते हैं, जिसके कारण उनका नाम "रणछोड़" पड़ा। भागते हुए भगवान एक गुफा में प्रवेश कर जाते हैं। गुफा में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पीतांबर ओढ़ाकर एक सोए हुए व्यक्ति (राजा मुचुकुंद) के पास छिप जाते हैं। कालयवन गुफा में आता है और सोए हुए व्यक्ति को श्रीकृष्ण समझकर कसकर लात मारता है। जैसे ही राजा मुचुकुंद की नींद टूटती है और वे अपनी आँखें खोलकर कालयवन को देखते हैं, उनकी दृष्टि मात्र से कालयवन जलकर भस्म हो जाता है। राजा मुचुकुंद का परिचय: राजा मुचुकुंद इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मान्धाता के पुत्र थे। उन्होंने लंबे समय तक देवताओं की ओर से असुरों के खिलाफ युद्ध किया था। जब युद्ध समाप्त हुआ, तो देवताओं ने उन्हें वरदान दिया कि वे अनवरत सो सकते हैं, और जो भी उन्हें बीच में जगाएगा, वह उनकी दृष्टि पड़ते ही भस्म हो जाएगा। भगवान का दर्शन और स्तुति: कालयवन के भस्म होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य चतुर्भुज रूप में राजा मुचुकुंद को दर्शन देते हैं। मुचुकुंद भगवान की सुंदर स्तुति करते हैं और संसार के विषय-भोगों को त्यागकर केवल भगवान के चरणों की सेवा (भक्ति) मांगते हैं। वरदान और अगला जन्म: भगवान उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर उन्हें निर्मल भक्ति का वरदान देते हैं और कहते हैं कि पूर्व जन्म में किए गए शिकार आदि के पापों को धोने के लिए उन्हें एक जन्म और लेना होगा, जहाँ वे एक ब्राह्मण (भक्त नरसी मेहता जी) के रूप में जन्म लेंगे और पूर्ण भगवत प्राप्ति करेंगे।