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जेल से जमानत मिलने के बाद भाई Ramdev Kakodiya Adivasi देर रात्रि तक अपनों के बीच सभा को सम्बोधित किया.....! 📍महारानी दुर्गावती शाह मंडावी चौक, निवारदी मिट्टी की खुशबू और वतन का प्यार साथ लाया हूं, मैं अपनों की खातिर जेल की दीवारें लांघ आया हूं। जब तक सूरज-चांद रहेगा, हक की जंग जारी रहेगी, जल-जंगल-जमीन की रक्षा अब और नये जोश और जूनून के साथ भारी रहेगी। जेल के ताले टूट गए, संघर्ष के साथी छूट गए। Ramdev Kakodiya Adivasi जी की रिहाई और उनके संघर्ष को सलाम "न्याय की जीत, संघर्ष की जीत! ✊🏹 जेल के ताले टूट गए, हक के रखवाले छूट गए! जल-जंगल-जमीन के सच्चे प्रहरी, आदिवासी समाज के लाडले रामदेव काकोडिया भैया को हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर हार्दिक बधाई और क्रांतिकारी जोहार। आपका संघर्ष हम सबके लिए प्रेरणा है। सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं। अब फिर से गूँजेगी जल-जंगल और जमीन के हक की आवाज़! सलाखें छोटी पड़ गईं उनके हौसलों के आगे, जो हक की लड़ाई लड़ते हैं, वो झुकते नहीं किसी के आगे। हमारे संघर्ष की जीत हुई, जिन साथियो ने इन बुरे दिनों में हमारा प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग किया उनको भी जीत की बधाई एव धन्यवाद जिस प्रकार इंट, भट्टी में पककर और भी ज़्यदा मजबूत होती है उसी प्रकार हम रामदेव काकोड़िया के साथ नई ऊर्जा और ताकत के साथ अंतिम व्यक्ति की लड़ाई नए सामर्थ्य के साथ लड़ेंगे। जैसे ही रामदेव काकोड़िया, पुर्व जयस प्रदेश अध्यक्ष, जेल से रिहा होकर गाँव पहुँचने के इंतजार में पूरा इलाका मानो साँस रोककर खड़ा हो गया। रात का अँधेरा भी उस उजाले को नहीं रोक सका जो लोगों की आँखों में चमक रहा था। बूढ़े हाथों की तालियाँ, युवाओं की उठी हुई मुट्ठियाँ और बच्चों की जिज्ञासु निगाहें—हर चेहरा यही कह रहा था कि “हमने अपना संघर्षशील भाई वापस पा लिया है।” यह स्वागत किसी नेता का नहीं, अपने ही घर के बेटे का था। जिन रास्तों पर रोज़ खामोशी पसरी रहती थी, वहाँ आज नारे नहीं—भावनाएँ गूँज रही थीं। किसी की आँखें भर आईं, किसी ने मोबाइल उठाकर उस पल को कैद किया, तो किसी ने चुपचाप हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया। गाँव की औरतें, बच्चे, बुज़ुर्ग—सब एक साथ बैठे थे, मानो यह जताने के लिए कि यह लड़ाई अकेले रामदेव काकोड़िया की नहीं थी, यह पूरे समाज की लड़ाई थी। जेल की सलाखों के पीछे बिताया गया समय आज लोगों की आँखों में सवाल बनकर खड़ा था—क्या सच बोलना अपराध है? क्या हक़ की आवाज़ उठाना गुनाह है? लेकिन आज के इस माहौल ने जवाब दे दिया। डर से ज़्यादा भरोसा था, थकान से ज़्यादा हौसला था। इस रात गाँव ने यह साबित कर दिया कि नेतृत्व कुर्सी से नहीं, लोगों के दिलों से मिलता है। रामदेव काकोड़िया की रिहाई एक व्यक्ति की आज़ादी नहीं, बल्कि उस विश्वास की जीत थी जो कहता है— संघर्ष दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं। आंन द स्पॉट न्यूज़ Ramdev Kakodiya Adivasi DrAnand Rai Kedar Sirohi Mahendra Kashiv Mehra Anuroop Bywar AB Vlogger