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तक़दीर का बंटवारा ______________ है बँधी तक़दीर जलती डार से, आशियाँ को छोड़ उड़ जाऊँ कहाँ? वेदना मन की सही जाती नहीं, यह ज़हर लेकिन, उगल आऊँ कहाँ? पापिनी कह जीभ काटी जाएगी, आँख-देखी बात जो मुँह से कहूँ, हड्डियाँ जल जाएँगी, मन मारकर जीभ थामे मौन भी कैसे रहूँ? तानकर भौंहें, कड़कना छोड़कर मेघ बर्फ़ी-सा पिघल सकता नहीं, शौक़ हो जिनको, जलें वे प्रेम से, मैं कभी चुपचाप जल सकता नहीं। बाँसुरी जनमी तुम्हारी गोद में देश-माँ, रोने-रुलाने के लिए, दौड़कर आगे समय की माँग पर जीभ क्या? गरदन कटाने के लिए। ज़िंदगी दौड़ी नई संसार में, ख़ून में सबके रवानी और है; और हैं लेकिन, हमारी क़िस्मतें, आज भी अपनी कहानी और है। हाथ की जिसकी कड़ी टूटी नहीं, पाँव में जिसके अभी जंज़ीर है; बाँटने को हाय! तौली जा रही, बेहया उस क़ौम की तक़दीर है! बेबसी में काँपकर रोया हृदय, शाप-सी आहें गरम आईं मुझे; माफ़ करना, जन्म लेकर गोद में, हिंद की मिट्टी! शरम आई मुझे। गुदड़ियों में एक मुट्ठी हड्डियाँ, मौती-सी ग़म की मलीन लकीर-सी। क़ौम की तक़दीर हैरत से भरी, देखती टुक-टुक खड़ी तसवीर-सी। चीथड़ों पर एक की आँखें लगीं, एक कहता है कि मैं लूँगा ज़बाँ; एक की ज़िद है कि पीने दो मुझे ख़ून जो इसकी रगों में है रवाँ! ख़ून! ख़ूँ की प्यास, तो जाकर पियो ज़ालिमो, अपने हृदय का ख़ून ही; मर चुकी तक़दीर हिंदुस्तान की, शेष इसमें एक बूँद लहू नहीं। मुस्लिमो, तुम चाहते जिसकी ज़बाँ, उस ग़रीबिन ने ज़बाँ खोली कभी? हिंदुओ, बोलो, तुम्हारी याद में क़ौम की तक़दीर क्या बोली कभी? छेड़ता आया ज़माना, पर कभी क़ौम ने मुँह खोलना सीखा नहीं। जल गई दुनिया हमारे सामने, किंतु हमने बोलना सीखा नहीं। ताव थी किसकी कि बाँधे क़ौम को एक होकर हम कहीं मुँह खोलते? बोलना आता कहीं तक़दीर को, हिंदवाले आसमाँ पर बोलते! ख़ूँ बहाया जा रहा इंसान का सींगवाले जानवर के प्यार में! क़ौम की तक़दीर फोड़ी जा रही मस्जिदों की ईंट की दीवार में। सूझता आगे न कोई पंथ है, है घनी ग़फ़लत-घटा छाई हुई, नौजवानो क़ौम के, तुम हो कहाँ? नाश की देखो घड़ी आई हुई। @Voice365 भावार्थ — “तक़दीर का बंटवारा” यह कविता देश और क़ौम की बँटी हुई, शोषित और मौन कर दी गई तक़दीर का करुण चित्रण है। कवि कहता है कि वह जली हुई डाल से बँधा पक्षी है—आशियाना छोड़कर भी उड़ नहीं सकता। मन की पीड़ा असह्य है, पर सच बोलने पर दंड का भय है; चुप रहना भी असंभव है। प्रेम से जलना जिनका शौक़ हो, वे जलें—कवि अन्याय के सामने मौन नहीं रह सकता। देश-माँ की गोद में जन्मी बाँसुरी रोने-रुलाने और समय की माँग पर बलिदान के लिए तत्पर है—यह संकेत है कि देश की संतानों से सत्य और त्याग की अपेक्षा है। दुनिया बदल रही है, सबके खून में नई रवानी है, पर हमारी क़िस्मत आज भी जंजीरों में जकड़ी अपनी ही दुखकथा दोहरा रही है। कवि उस बेहया व्यवस्था पर चोट करता है जो बँधी हुई क़ौम की तक़दीर को तौलकर बाँट रही है। इस बेबसी में कवि को देश की मिट्टी से जन्म लेने पर भी लज्जा होती है। क़ौम की हालत फटे चीथड़ों में पड़ी हड्डियों जैसी है—सब देखते हैं, पर कोई बचाने नहीं आता। विभिन्न समुदाय अपनी-अपनी माँगों के लिए क़ौम के खून तक को पीना चाहते हैं, जबकि सच यह है कि हिंदुस्तान की तक़दीर का खून पहले ही बह चुका है। कवि मुस्लिमों और हिंदुओं—दोनों से प्रश्न करता है कि क्या कभी इस गरीब क़ौम की तक़दीर ने बोलने का अवसर पाया? अत्याचार सहते-सहते भी क़ौम ने बोलना नहीं सीखा। धर्म और प्रतीकों के नाम पर इंसान का खून बहाया जा रहा है; मस्जिदों की ईंटों और दीवारों में क़ौम की तक़दीर तोड़ी जा रही है। आगे कोई रास्ता स्पष्ट नहीं, ग़फ़लत का अंधकार छाया है। अंत में कवि युवाओं को पुकारता है—नाश का समय आ पहुँचा है, जागो, अन्याय के विरुद्ध खड़े होओ और मौन तोड़ो। @Voice365 ramdhari singh dinkar dinkar kavita takdeer ka bantwara rashtrakavi dinkar poem hindi revolutionary poetry powerful hindi poem nationalism poetry hindi hindi kavita path hindi poetry recital desh bhakti kavita social justice poetry fearless hindi poetry truth of india poem indian history poetry hindi literature classic voice 365 poetry voice365 hindi poem viral hindi poetry emotional hindi poem hard hitting poetry hindi #RamdhariSinghDinkar #DinkarPoetry #HindiPoetry #RevolutionaryPoetry #RashtrakaviDinkar #IndianPoetry #NationalPoetry #PowerfulPoem #FearlessPoetry #HindiKavita #DeshBhaktiPoem #SocialPoetry #TruthOfNation #VoiceOfIndia #PoetryThatHurts #PoetryThatSpeaks #HindiLiterature #IndianHistoryPoetry #MotivationalPoetry #Voice365