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सम्यग्ज्ञान 💢रत्नकरंडक श्रावकाचार स्वाध्याय💢 जुड़ें हमारे telegram से - https://t.me/samyagyan रत्नकरण्ड श्रावकाचार[4]- रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्रावक के आचरण पर हैं इसमें १५० श्लोक हैं।तत्त्वार्थ सूत्र पर टीका [5]जिसका मंगलाचरण अप्त-मीमंसा के नाम से प्रख्यात हुआ।[6]आप्त-मीमंसा- ११४ श्लोकों में जैन धर्म के अनुसार केवल ज्ञान समझाया गया हैं इसमें केवली के गुणों का वर्णन हैं। [7]स्वयम्भू-स्तोत्र- २४ तीर्थंकरों की स्तुति।[8]युक्तानुशासन – 'युक्तानुशासन' एक काव्य रचना है जिसके ६४ श्लोकों में तीर्थंकर महावीर स्वामी की स्तुति की गयी है।[9] आचार्य समन्तभद्र मुनि को संन्यास जीवन के शुरुवाती वर्षों में भस्मक नाम की व्याधि हो गयी थी जिसमें तिर्ष्ण भूख लगती हैं। चूँकि दिगंबर मुनि एक बार से ज्यादा आहार नहीं लेते, उन्हें इससे काफी कष्ट होने लगा[10] जिसके कारण अंत में उन्होंने सल्लेखना व्रत धारण करने का सोचा जब उन्होंने अपने गुरु से इसके लिए आज्ञा मांगी तो गुरु ने इसकी आज्ञा नहीं दी।[11] उनके गुरु ने उन्हें मुनि व्रतों का त्याग कर रोग उपचार करने को कहा।[10] उपचार के बाद आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने दोबारा मुनि व्रतों को धारण किया और महान आचार्य हुए।[12] #samyggyan#ratnkarandak#samntbhadrac hary