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यद्द्पि मानव जीवन पारस्परिक सामाजिक सम्बन्धों से इस प्रकार जुड़ा हुवा है जैसे कि एक सूत्र में पिरोये गये हार के दाने तथापि इन पारस्परिक सम्बन्धौ में माता तथा पुत्र का वात्सल्य, भाई तथा बहिन की ममता और पति -पत्नी के प्यार का ब्यवहारिक स्वरुप भिन्न है। जिस सम्बन्ध को एक बार जुड़ जाने के पश्च्यात पृथक नही किया जा सकता । लेकिन पुत्र वात्सल्य भ्रातृ स्नेह तथा दाम्पत्य जीवन का यह सुख सब किसी को प्राप्त नही होता है। एक ऐसी ही भ्रातृ विहीन नारी उस समय ढुल-ढुल रोती है जब चेत मास के आगमन पर दयोरानी -जेठानी के भाई भेटोली लेकर आने लगते है तथा घर आंगन में मिरासी युगल चैत मास का ऋतु गीत गाने लगता है। उपरोक्त ऋतु गीत का रिकॉर्डिंग डा0 शेर सिंह पांगती जी ने 1970-80 के दशक में साधारण सा टेपरिकार्डर से रिकार्ड किया गया था । उपरोक्त गीत किसी स्टूडियो में रिकॉर्ड नही किया गया है । उनके जीवन काल के अन्तिम पड़ाव से पूर्व मेंने उनसे निवेदन किया की कल इस तरह के गीत संरक्षित नही किया तो विलुप्त हो जायेंगे अतः उन्होंने मुझे बिना किसी प्रकार के छेडछाड के काम करने हेतु मोखिक अनुमति दी उनके अनुमति को आशिर्वाद समझ कर में यह गीत को आप जनता को समर्पित कर रहा हूं | साभार -ःजोहार के स्वर पुस्तक से। ****फाम एक विरासत ***** गायक - श्री गबरु मिरासी गायिका - श्रीमती लछीमा मिरासी टेप रिकार्डिंग - डा.शेर सिंह पांगती प्रस्तुति - देबू पांगती Follow me on facebook / devu.pangtey. .