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Kavi/Poet Girija Kumar Mathur | Kavi Sammelan | 1989 Reciting Hindi Kavita/Poem Chaya Mat Chuna छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना। जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी; तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी, कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी। भूली सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना। यश है या न वैभव है, मान है न सरमाया; जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया। प्रभुता का शरण बिंब केवल मृगतृष्णा है, हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है। जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना। दुविधा हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं, देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं। दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर, क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर? जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण, छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना। This Poem is a part of the NCERT syllabus in Class 10 Hindi Grammar lessons.