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गणेश व्रत कथा | Ganesh Vrat Katha | Ganesh Ji Ki Pavan Katha | Ganesh Ji Katha | Ganesh Vrat 🔔 मेरे प्रिय भक्तों आप सभी से अनुरोध है कि @WingsSpiritualindia चैनल को Subscribe करें व भक्ती भजनो का आनंद ले व अन्य भक्तों के साथ SHARE करें व LIKE जरूर करें 🙏 / @wingsspiritual गणेश व्रत कथा : एक गाँव में सरला नाम की एक बूढ़ी औरत रहती थी। वह गणेश जी की बहुत बड़ी भक्त थी। भक्त और भगवान के बीच का संबंध बहुत ही पवित्र और अटूट होता है। सरला अपने गणेश जी को एक छोटे बालक की तरह मानकर उनसे वात्सल्य रखती थी। वह उन्हें कहती – “चलो गणेश, अब नहाने का समय हो गया है। फिर नाश्ता भी करना है।” कैलाश पर्वत पर बैठे भगवान गणेश, माता पार्वती और भगवान शिव यह सब देख रहे थे। शिवजी भी उस बूढ़ी मां के वात्सल्य को देखकर मुस्कुराने लगे। लेकिन पार्वती माता को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कहा – “गणेश पर मुझसे अधिक कोई वात्सल्य नहीं बरसा सकता। यह बूढ़ी औरत जरूर स्वार्थवश तुम्हारी पूजा करती है।” गणेश जी ने विनम्रता से उत्तर दिया – “माते, उसकी भक्ति निस्वार्थ है। वह निर्धन है, उसके पास मांगने के लिए कुछ भी नहीं। मैं स्वयं उसकी भक्ति की परीक्षा लूँगा।” फिर गणेश एक छोटे बालक का रूप धरकर पृथ्वी लोक पर उतरे। उनके हाथ में एक छोटा-सा कमंडल था जिसमें थोड़े से चावल और दूध था। वे गाँव में पुकारने लगे – “कोई मेरे लिए खीर बना दो। मेरे पास चावल और दूध है।” लोग उनका मज़ाक उड़ाने लगे। इतने थोड़े चावल-दूध से भला खीर कैसे बनेगी? लेकिन सरला ने प्रेमपूर्वक कहा – “ला बेटा, मैं बना देती हूँ। मैं तो रोज़ अपने गणेश को भोग लगाती ही हूँ।” बालक ने कहा – “दादी, यह छोटी भगौनी मत चढ़ाओ। तुम्हारे घर का सबसे बड़ा बर्तन निकालो।” सरला ने संकोच किया, पर अंततः बड़े बर्तन में चावल और दूध डाले। आश्चर्य हुआ कि वह बर्तन पूरा भर गया। सरला खीर बनाने लगी। जब खीर तैयार हुई तो उसकी सुगंध से सारे बच्चे रोने लगे और खाने को मांगने लगे। सरला ने पहले गणेश को भोग लगाया, फिर बच्चों को खीर खिलाई। पड़ोसन को भी प्रसाद दिया। यहां तक कि घर की बहू ने भी छुपकर खीर खाई। अंत में सरला ने स्वयं भी खीर खा ली। तभी बालक रूपी गणेश आए। सरला बोली – “आओ बेटा, खीर खा लो। मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रही थी।” गणेश मुस्कुराए और बोले – “दादी, मैंने तो पहले ही खा ली। जब-जब तुमने बच्चों, पड़ोसन और बहू को खीर दी, तब-तब मैं ही खा रहा था। अब मेरा पेट भर गया है।” सरला हतप्रभ रह गई। गणेश ने कहा – “बची हुई खीर को नगरवासियों में बाँट दो।” उसने ऐसा ही किया। पूरा नगर खीर खाकर भी तृप्त हो गया और बर्तन फिर भी भरा रहा। यह समाचार राजा तक पहुँचा। सैनिकों ने सरला को दरबार में बुलाया। राजा ने उस बर्तन को महल में रखने का आदेश दिया। लेकिन जैसे ही बर्तन महल में लाया गया, खीर सड़ गई और उसमें कीड़े-मकोड़े हो गए। राजा ने डरकर बर्तन वापस सरला को दे दिया। सरला ने घर जाकर पूछा – “गणेश, अब इस खीर का क्या करूँ?” गणेश ने कहा – “इसे चार पात्रों में भरकर आँगन में गाड़ दो।” सरला ने ऐसा ही किया। अगले दिन जब उसने गड्ढा खोदा तो उसे धन से भरे हुए मटके मिले। तभी गणेश जी ने उसके झोपड़े में पाँव रखा और उसकी झोपड़ी हवेली में बदल गई। इसके बाद गणेश जी कैलाश लौट आए और माता-पिता को बोले – “देखा माते, सरला की निस्वार्थ भक्ति? सचमुच ऐसा भक्त दुर्लभ है।” माता पार्वती की आँखें नम हो गईं। उन्होंने कहा – “पुत्र, तू सही कह रहा था। धन्य है वह बूढ़ी माई और उसकी भक्ति।” भगवान गणेश ने आशीर्वाद दिया – “जो भी इस कथा को सुनेगा या पढ़ेगा, उसके जीवन से दरिद्रता दूर होगी, सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होगी।” बोलो गणपति बप्पा मोरया! Music Label: Wings Music © & ℗ Wings Entertainment Ltd #GaneshVratKatha #GaneshStory #LordGanesha