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नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) - भूमिका ऊर्जा किसी भी देश के आर्थिक, सामाजिक और औद्योगिक विकास का मूल आधार होती है। आधुनिक युग में बिजली, परिवहन, उद्योग, कृषि, संचार तथा वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए ऊर्जा की भारी मात्रा में आवश्यकता होती है। पारंपरिक ऊर्जा स्रोत जैसे कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस सीमित हैं तथा इनके अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण भी बढ़ रहा है। इसलिए विश्व भर में वैकल्पिक और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की खोज की जा रही है। इसी संदर्भ में नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) एक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली ऊर्जा स्रोत के रूप में उभरकर सामने आई है। नाभिकीय ऊर्जा परमाणु के नाभिक से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है। यह ऊर्जा अत्यंत शक्तिशाली होती है और कम मात्रा में ईंधन से अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। आज कई देश बिजली उत्पादन के लिए नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं। भारत भी नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहा है। 1. नाभिकीय ऊर्जा का अर्थ -: नाभिकीय ऊर्जा वह ऊर्जा है जो परमाणु के केंद्र यानी नाभिक (Nucleus) में मौजूद होती है। जब परमाणु के नाभिक में परिवर्तन होता है—जैसे नाभिक का टूटना (विखंडन) या नाभिकों का आपस में मिलना (संलयन)—तब बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। सरल शब्दों में कहा जाए तो परमाणु के नाभिक में छिपी ऊर्जा को नाभिकीय ऊर्जा कहा जाता है। 2. परमाणु की संरचना नाभिकीय ऊर्जा को समझने के लिए परमाणु की संरचना को समझना आवश्यक है। एक परमाणु मुख्यतः तीन कणों से मिलकर बना होता है: प्रोटॉन (Proton) – धनात्मक आवेश वाला कण न्यूट्रॉन (Neutron) – आवेश रहित कण इलेक्ट्रॉन (Electron) – ऋणात्मक आवेश वाला कण प्रोटॉन और न्यूट्रॉन मिलकर परमाणु के केंद्र में नाभिक बनाते हैं जबकि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर घूमते रहते हैं। नाभिक के अंदर बहुत अधिक ऊर्जा संचित होती है। यही ऊर्जा परमाणु अभिक्रियाओं के दौरान मुक्त होती है। 3. नाभिकीय ऊर्जा की खोज नाभिकीय ऊर्जा की खोज वैज्ञानिकों के लंबे अनुसंधान का परिणाम है। मुख्य वैज्ञानिक योगदान: हेनरी बेकरल (Henri Becquerel) – 1896 में रेडियोधर्मिता की खोज मैरी क्यूरी और पियरे क्यूरी – रेडियोधर्मी तत्वों का अध्ययन अल्बर्ट आइंस्टीन – प्रसिद्ध समीकरण 𝐸 = 𝑚𝑐2, जिसके अनुसार द्रव्यमान को ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। ओट्टो हान और फ्रिट्ज स्ट्रासमैन – 1938 में नाभिकीय विखंडन की खोज इन खोजों के बाद वैज्ञानिकों को समझ आया कि परमाणु से अत्यधिक ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। 4. नाभिकीय ऊर्जा के प्रकार नाभिकीय ऊर्जा मुख्यतः दो प्रकार से प्राप्त की जाती है: 1. नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) जब किसी भारी परमाणु (जैसे यूरेनियम) के नाभिक को न्यूट्रॉन से टकराया जाता है तो वह दो छोटे नाभिकों में टूट जाता है और अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। उदाहरण: यूरेनियम-235 इस प्रक्रिया में: ऊर्जा, न्यूट्रॉन, विकिरण, उत्पन्न होते हैं। यह प्रक्रिया नाभिकीय रिएक्टर और परमाणु बम दोनों में उपयोग होती है। 2. नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) जब दो हल्के परमाणु आपस में मिलकर भारी परमाणु बनाते हैं तो बहुत अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। उदाहरण: हाइड्रोजन परमाणु मिलकर हीलियम बनाते हैं। यह प्रक्रिया सूर्य और तारों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। संलयन से विखंडन की तुलना में कई गुना अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है, लेकिन इसे नियंत्रित करना अभी भी कठिन है। 12. नाभिकीय ऊर्जा के नुकसान 1. रेडियोधर्मी कचरा इसका निपटान करना कठिन होता है। 2. दुर्घटना का खतरा यदि रिएक्टर में दुर्घटना हो जाए तो भारी नुकसान हो सकता है। 3. निर्माण लागत अधिक नाभिकीय संयंत्र बनाने में बहुत खर्च होता है। 4. परमाणु हथियारों का खतरा नाभिकीय तकनीक का उपयोग हथियार बनाने में भी हो सकता है। 13. प्रमुख नाभिकीय दुर्घटनाएँ 1. चेरनोबिल दुर्घटना (1986) यूक्रेन में हुई यह दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटना थी। 2. फुकुशिमा दुर्घटना (2011) जापान में भूकंप और सुनामी के कारण रिएक्टर क्षतिग्रस्त हो गया। इन दुर्घटनाओं के बाद दुनिया में परमाणु सुरक्षा को लेकर नई नीतियाँ बनाई गईं। 14. नाभिकीय ऊर्जा और पर्यावरण नाभिकीय ऊर्जा को अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा स्रोत माना जाता है क्योंकि इससे कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होता है। लेकिन रेडियोधर्मी कचरे के कारण पर्यावरणीय खतरे भी मौजूद हैं। इसलिए सुरक्षित तकनीक और कचरा प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। निष्कर्ष नाभिकीय ऊर्जा आधुनिक विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक है। यह ऊर्जा उत्पादन का शक्तिशाली और प्रभावी स्रोत है। बढ़ती ऊर्जा मांग और पर्यावरणीय समस्याओं के कारण दुनिया भर में नाभिकीय ऊर्जा का महत्व बढ़ रहा है। हालांकि इसके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हुए हैं, लेकिन सुरक्षित तकनीक और उचित प्रबंधन के माध्यम से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए नाभिकीय ऊर्जा ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प है। इसलिए भविष्य में नाभिकीय ऊर्जा मानव सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।