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हस्तिनापुर का समस्त वृतांत सुना रहे अक्रूर से श्रीकृष्ण विदुर से जुड़े का रहस्य का उजागर करते हुए हैं कि महर्षि माण्डव्य के श्राप के कारण धर्मराज को मानव योनि में जन्म लेना पड़ा है। पूर्वकाल में एक राजा के सैनिकों ने अनजाने में महर्षि माण्डव्य को चोरों का आश्रयदाता समझकर बंदी बना लिया था और राजा ने बिना जांच-पड़ताल किए उन्हें सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया। अपनी योगशक्ति के कारण महर्षि की मृत्यु नहीं हुई और वह सूली पर ही तपस्या करने लगे। जब राजा को अपनी भूल का आभास हुआ, तो उसने क्षमा मांगी। माण्डव्य ऋषि ने इस अन्याय का कारण जानने के लिए धर्मराज (यमराज) से प्रश्न किया। धर्मराज ने बताया कि बचपन में महर्षि ने कुछ कीट-पतंगों को सींक चुभाई थी, जिसका फल उन्हें इस जन्म में मिला। महर्षि ने तर्क दिया कि बारह वर्ष तक की आयु का बालक अबोध होता है और उसके कार्यों को अपराध नहीं माना जा सकता। इस छोटे से अपराध के लिए कठोर दंड देने के कारण माण्डव्य ऋषि ने धर्मराज को श्राप दे दिया कि उन्हें पृथ्वी पर शूद्र योनि में दासी पुत्र (विदुर) के रूप में जन्म लेना होगा और इसी कारण से कि विदुर नीति और न्याय के ज्ञाता होने के बावजूद दासी पुत्र कहलाए। अक्रूर यह जानना चाहते थे कि क्या विदुर अपनी वास्तविकता से परिचित हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि मानव शरीर प्रकृति के नियमों के अधीन है, जिसके कारण जीव को अपने पूर्व जन्म या भविष्य का भान नहीं रहता। हालाँकि, वह यह आश्वासन भी देते हैं कि देह त्यागने से पूर्व विदुर को अनिवार्य रूप से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होगी। वही दूसरी ओर हस्तिनापुर द्वारा मथुरा को सहायता देने से इनकार करने के की सूचना जरासंध का मनोबल बढ़ा जाता है, वह अपने सैन्य शिविर में वह शल्य, बाणासुर और शिशुपाल जैसे राजाओं के साथ रणनीति बनाता है। जरासंध की प्रारंभिक इच्छा मथुरा को पूरी तरह तहस-नहस करने की थी, किंतु मद्र नरेश शल्य और बाणासुर उसे एक व्यावहारिक परामर्श देते हैं। उनका तर्क है कि इतने वैभवशाली नगर को नष्ट करने के बजाय उसे मगध साम्राज्य में मिला कर उनकी प्रजा पर भारी कर लगाना अधिक श्रेयस्कर होगा। जहाँ तक कंस की मृत्यु के प्रतिशोध का प्रश्न है, वह कृष्ण और बलराम को सूली पर चढ़ा कर पूरा किया जा सकता है। बाणासुर सुझाव देता है कि यादव सरदारों को बंदी बनाकर राजगीर के कारागार भेज दिया जाए। आक्रमण से पूर्व, जरासंध राजा शूरसेन को एक अपमानजनक चेतावनी पत्र भेजता है, जिसमें मथुरा की रक्षा के बदले कृष्ण और बलराम के आत्मसमर्पण की मांग की जाती है। इस पत्र ने मथुरा के राजसभा में संकट की स्थिति पैदा कर दी। जहाँ अक्रूर और अधिकांश मंत्री युद्ध के पक्ष में थे, वहीं एक मंत्री ने नगर की रक्षा हेतु कृष्ण-बलराम के बलिदान और जनमत संग्रह का प्रस्ताव रखता है। अक्रूर ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए तर्क दिया कि जिसने मथुरा को कंस के अत्याचारों से मुक्त कराया, उसके प्रति ऐसी कृतघ्नता अक्षम्य है। श्रीकृष्ण इस पूरी चर्चा के दौरान शांत रहते हैं और वह अक्रूर को भी धैर्य रखने का संकेत देते हैं। अंततः, महाराज शूरसेन स्वाभिमान का मार्ग चुनते हैं और जरासंध को उत्तर भेजते हैं कि यादव के सर कटा सकते हैं, पर झुका नहीं सकते। जब यह उत्तर जरासंध को प्राप्त होता है, वह युद्ध की घोषणा करते हुए अपने मित्रों राजाओं के साथ मथुरा के चारों प्रवेश द्वारों को घेरने की रणनीति बनाता है। उसका केवल अब एक ही उद्देश्य होता है मथुरा का पूरी तरह से विनाश। सम्पूर्ण जगत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार एवं सोलह कलाओं के स्वामी भगवान श्री कृष्ण काजीवन धर्म, भक्ति, प्रेम, और नीति का अद्भुत संगम है। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कारागार में जन्म लेकर गोकुल की गलियों में यशोदा और नंदबाबा के यहाँ पलने वाले, अपनी लीलाओं, जैसे पूतना वध, माखन चोरी, राधा के संग प्रेम, गोपियों के साथ रासलीला और कालिया नाग के दमन के लिए प्रसिद्ध श्री कृष्ण ने युवावस्था में मथुरा कंस का वध करके जनमानस को उसके अत्याचार से मुक्त कराया एवं स्वयं के लिए द्वारका नगरी स्थापना भी की। उनका जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज को धर्म और कर्म का गूढ़ संदेश देने के लिए महाभारत के युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बनकर उसे "श्रीमद्भगवद्गीता" का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन की समस्याओं का समाधान बताने वाला महान ग्रंथ माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, त्याग, और नीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आपका प्रिय चैनल "तिलक" श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ा यह विशेष संस्करण "श्री कृष्ण जीवनी" आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाओं का संकलन किया गया है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए। #tilak #krishna #shreekrishna #shreekrishnajeevani #krishnakatha