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[Instrumental] गुरुर्ब्रह्मा , गुरुर्विष्णु , गुरुर्देवो महेश्वरः , गुरु साक्षात् परं ब्रह्म , तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ मैं जहाँ रहूँ , मैं जहाँ चलूँ , जो साथ सदा मेरे साथ रहे । जो वस्त्र बदलूँ , जो रूप धरूँ, पर भीतर दीप जलाता रहे ॥ आज भी रोया हूँ शरणागति में , बिन चरण-स्पर्श , बिन संग वास । गुरु ही बस् मेरा श्वास ॥ दुनिया पूछे – “कैसा गुरु?” जो दिखे नहीं, जो पास नहीं। मैं कह दूँ—वो परमात्मा है , हर कर्म में है, हर श्वास में है॥ जहाँ काम करूँ , जहाँ नाम कमाऊँ , हर निर्णय में वो मौन बसे। अदृश्य रूप में भीतर बैठा , हामारे अहंको हर क्षण तोडे॥ गुरु-बुद्धि बिना बस अहंकार , ज्ञान नहीं—केवल भारी भार। गुरु की दृष्टि जब तक न मिले , कैसे मिटे मन का अंधकार ? गुरु-संनिधि में जीवन सीखे , झुकना क्या है, प्रेम क्या । गुरु न हो तो कैसे जाने , भक्ति क्या है, नेह क्या ॥ मंदिरमें भी, आश्रम में भी, साथ रहा उनके हर क्षण। आज भी वही गुरु हैं, मेरे जीवन का एकमात्र वरण॥ मैं जहाँ जियूँ , मैं जहाँ मरूँ , उस सत्य को नमन करूँ । जो भीतर है, जो बाहर है , मैं उसी गुरु को वंदन करूँ ॥ हे गुरु, दिखो न दिखो, साथ रहो न रहो पर मेरा होना, आपसे ही है… गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरु साक्षात् परं ब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥