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मन को शांत और स्थिर कैसे करें? | Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 55 | Sthitaprajna Meaning Description (विवरण) नमस्ते दर्शकों, श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 55वाँ श्लोक आध्यात्मिक यात्रा में एक मील का पत्थर है। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि एक 'स्थितप्रज्ञ' (स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति) कौन है और उसके लक्षण क्या हैं। इस वीडियो में आप जानेंगे: मन की इच्छाओं पर नियंत्रण कैसे पाएं? सच्ची आत्म-संतुष्टि का क्या अर्थ है? अध्याय 2, श्लोक 55 का सरल हिंदी भावार्थ और सार। श्लोक: प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ मुख्य संदेश: सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने भीतर स्वयं को जानने में है। जब हम कामनाओं का त्याग कर अपनी आत्मा में संतुष्ट होते हैं, तभी हमें स्थायी शांति मिलती है। अगर आपको यह जानकारी प्रेरणादायक लगी हो, तो वीडियो को लाइक करें और ऐसी ही आध्यात्मिक चर्चाओं के लिए चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। #BhagavadGita #GeetaSaar #Sthitaprajna #KrishnaQuotes #Spirituality #PeaceOfMind #Hinduism #GitaChapter2 Bhagavad Gita, Chapter 2 Shloka 55, Geeta Adhyay 2 Shloka 55, Sthitaprajna Lakshana, Lord Krishna Updesh, Meaning of Sthitaprajna, Gita Shlok in Hindi, Spiritual Wisdom, How to control mind, Peace of mind Gita, Bhagavad Gita for students, Shlok 55 Saar, Sankhya Yoga.