У нас вы можете посмотреть бесплатно Main Tu Hi Hoon, Arjun || मैं तू ही हूँ, अर्जुन || Bhagavad Gita | Motivational Song или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
Lyrics: मैं तू ही हूँ, अर्जुन मैं तू ही हूँ, अर्जुन, सुन ले अब मेरी व्यथा, द्वापर की थी तेरी, कलियुग में मेरी कथा। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, बस सामाजिकता से गांधारी हूँ, खोज रहा हूँ राह अपनी, माया महामारी से कैसे बचूँ। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, तू मन की मार से लाचार था, कर्तव्य का मार्ग धुंधलाता देख, तू कितना बेचारा था। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, तू कुटुंब के मोह में फँसा था, मैं समाधान और सुकून के बीच, पिसता हूँ यूँ— करूँ क्या। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, तुझे धर्म-युद्ध की कामना न थी, अपने ही रक्त के, रक्त से, हाथ लाल करने की भावना न थी। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, पाप-कर्म की क्रम-गिनती में, छप्पर फाड़े हूँ, सज्जनता का बेदाग, श्वेत चोला ओढ़े, गिने-चुने पुण्यों के सहारे हूँ। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, मेरे भीतर भी एक महाभारत जारी है, संसार… या समर्पण? इस दुविधा से बचने की, अब मेरी बारी है। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, शिष्य होकर तू भगवान की शरण को पाया था, उन्होंने तुझे उस दिव्य-ज्ञान से, फिर सत्य का वह दर्पण दिखाया था। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, जगद्गुरु की कृपा मुझे भी अब पानी है, समाज के स्वांग में, ढोंगी बनने की, अस्वीकार मुझे यह कहानी है। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, जनार्दन की छत्रछाया में, अब मैं भी रहूँगा, उस जकड़ने वाली माया महामारी के निर्मम प्रकोप से, मैं कदापि न डरूँगा। अर्जुन… मंच है! ज्ञान… प्रचंड है! मध्य… कुरुक्षेत्र! समाधान… अनंत है! परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे || क्यों हाथ न तेरे अब उठे, उठे, क्यों कदम हैं तेरे अब रुके, रुके, क्यों मोह के आगे तू झुके, झुके, जाग क्षत्रिय, तेरा धर्म पुकारे तुझे! मोह रूपी दल-दल में क्यों फँसा है, सामने, कुटुंब नहीं, शत्रु खड़ा है, माधव की सुन, क्षत्रिय को बाहर खींच, तेरा मन ही खड़ा है, तेरे और कर्तव्य के बीच! मैं तू ही हूँ, अर्जुन, अब पाप-बंधन को मुझे सौतेला सा ठुकराना है, ब्रह्म-रस का सुकून चख, मोह की इस निशा में, तुझसा गुडाकेश हो जाना है। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, गांधारी पट्टी अब खोल, मैं न धृतराष्ट्र सा असहाय रहूँगा, हर मन में बसते उस कपटी दुर्योधन पर मैं, अब ज्ञानास्त्र से प्रहार करना ही अपना कर्तव्य समझूँगा। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, कलियुग की जलती धूप से, अब गीता-सी छाँव में बचना है, केशव के सुनाए उस यथार्थ पथ पर, अब अंतिम समाधान-स्वरूप बढ़ना है। ________________________________________ मैं तू ही हूँ, अर्जुन, अब समय आ गया, मैं अपनी व्यथा स्वयं सुधारूँगा, पार्थ-रूपी पात्र बन, दुग्धम-गीतामृत मुझसे जुड़े हर मन को भी पिलाऊँगा। मैं तू ही हूँ, अर्जुन, मैं तू ही हूँ, अर्जुन… ________________________________________ Song description: “मैं तू ही हूँ, अर्जुन” एक ऐसा गीत है जो कुरुक्षेत्र को इतिहास की किताब से उठाकर सीधे आज के इंसान के भीतर रख देता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब सामने युद्ध था, और आज भीतर। कलियुग में आदमी अक्सर बाहर से “सब ठीक है” दिखाता है, लेकिन अंदर कहीं न कहीं वही अर्जुन बैठा है, जो मोह, डर, जिम्मेदारी, और आत्म-संदेह के बीच पिस रहा है। इस गाने के शब्द एक modern man की हालत को अर्जुन की व्यथा से जोड़ते हैं। समाज की social masking, सही दिखने की मजबूरी, “संसार या समर्पण” की उलझन, और वो माया जो सोच को धुंधला कर देती है। “माया महामारी” का रूपक इसी के लिए है, जैसे हर तरफ शोर है, और उसी शोर में अपनी राह सबसे ज्यादा खो जाती है। यहां शत्रु अक्सर बाहर नहीं होता, वो मन के बीच खड़ा होता है, तुम्हारे और कर्तव्य के बीच। गीत का केंद्र दुख नहीं है, दिशा है। जैसे अर्जुन को उत्तर बाहर से नहीं, भीतर की स्पष्टता से मिला था, वैसे ही यह गाना कहता है कि समाधान भी उसी जगह से शुरू होगा। भगवद गीता का ज्ञान यहां उपदेश नहीं बनता, बल्कि एक practical रोशनी बनकर आता है, जो confusion को काटता है, मोह की पट्टी खोलता है, और इंसान को फिर से अपने धर्म, अपने कर्म, और अपने निर्णय तक लौटाता है। यह उन लोगों के लिए है जो थक चुके हैं “strong दिखने” से, और अब सच में मजबूत बनना चाहते हैं। जो अपने अंदर चल रहे महाभारत को पहचानते हैं, और उसे टालने नहीं, समझकर पार करने की जगह खोज रहे हैं। “Main Tu Hi Hoon, Arjun” is a song that takes the story of Kurukshetra and brings it into the life of a modern man living in Kalyug. The battle is not on a battlefield anymore. It is inside the mind. The lyrics draw a clear parallel between Arjun’s breakdown and the confusion people feel today. On the outside, life looks normal, but inside there is stress, fear, overthinking, and pressure to act “good” in front of society. The song talks about being stuck between comfort and responsibility, peace and solutions, “worldly life” and surrender. It calls this mental trap a kind of “maya pandemic”, a fog that makes your path unclear and keeps you trapped in doubt. The core message is not sadness. It is direction. Just like Arjun found clarity through the wisdom of the Bhagavad Gita, the modern man can also come out of confusion through knowledge, discipline, and right action. The song reminds you that the real enemy is often not outside. It is the hesitation, attachment, and fear standing between you and your duty. If you have ever felt lost, stuck, or pulled in different directions, this song is for you. It is about waking up, seeing reality clearly, and choosing the path of dharma and karma with courage.