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*लता मंगेशकर वह अमर गायिका हैं जिनके अमर सुर भारतीय जन मानस के अंतर्मन में समाहित हो चुके हैं ! लता मंगेशकर के बिना संगीत और संगीत के बिना लता मंगेशकर केवल और केवल असंभव है ! जैसे आध्यात्म में और योग में भी बड़े बड़े संत योगी , ईश्वरीय अवतार होते हैं वैसे ही संगीत में लता एक अवतार बनकर ही प्रकट हुई ! प्रत्येक संगीत रसिक यह समझ सकता है कि हिंदी फिल्म उद्योग में लता जी के पदार्पण के पहले याने सन १९५० से पहले संगीत कैसा था और १९५० के बाद कैसा हो गया ! वह एक अकेली लता जी ही थी जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को एक ऊंचाई प्रदान की , नया आयाम दिया ! लता से पहले की गायिकाएं काली चार या पांच को सा मानकर ही गा पाती थी परन्तु लता काली एक और काली दो में भी श्रेष्ठता के साथ , सहजता से गा लेती थी ! जिससे संगीतकारों को युगल गीत बनाने में आसानी हो गई क्योंकि रफी , मुकेश और मन्ना डे जी का प्राकृतिक सा काली दो का था ! लता जी को शास्त्रीय संगीत में वो महारत हासिल थी , जो बड़े बड़े पंडितों और उस्तादों को नसीब नहीं थी ! जैसा कि फैय्याज खान साहब ने कहा था " हम अपना गायन तीन घंटे में जमा पाते हैं पर लता तीन मिनिट में ही उससे भी ज्यादा खूबसूरत गाकर , रंग जमा देती है !" यही कारण था कि हुस्नलाल भगतराम , गुलाम हैदर , गुलाम मोहम्मद आदि ने लता जी के गायन का पूर्ण उपयोग किया ! नौशाद , रौशन , सी रामचंद्र और वसंत देसाई ने तो कबूल किया कि हीरोइन के लिए हमारी शास्त्रीय संगीत पर आधारित जितनी भी रचनाएं हमने बनाई वो सिर्फ लता जी की वजह से , लता ना होती तो वो धुनें भी नहीं होती ! एस एन त्रिपाठी जी और आदी नारायण राव जी तो शास्त्रीय संगीत के प्रकांड पंडित थे , उनकी तो अधिकांश रचनाएं विशुद्ध शास्त्रीय रागों पर ही आधारित होती थी , उनके लिए तो लता किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं थी ! मदन मोहन संगीत सीखे हुए नहीं थे इसीलिए वे शास्त्रीय आधार पर गीत नहीं बना पाते थे , जो दो तीन ही गीत उन्होंने रागों के आधार से बनाए हैं , तब हर बार वे लता जी को केवल राग का नाम बता देते थे , फिर कहते थे कि अब आप ही ये गीत कंपोज कर लीजिए और जैसा उचित लगे गा दीजिए ! 🤔😇😄 लता ने अपने महान पिता दीनानाथ मंगेशकर जी से ललित , भैरव , गौड़ सारंग , गौड़ मल्हार , जयजयवंती और मालकौंस आदि राग सीखे थे ! उनका भरपूर उपयोग उन्होंने अपने फिल्मी गायन में किया ! बाद में लता जी ने उस्ताद अमान अली खान साहब से तालीम ली ,उन्होंने लता जी को भीमपलासी , पूर्वी , दरबारी , अड़ाना , भैरवी आदि राग सिखाए , इन रागों में भी लता जी ने खूब गाया ! लता जी का गायन , परिपूर्ण था , उत्कृष्ट था और दोष रहित था ! उन के गायन में मधु का माधुर्य था , उनका पंचम कोयल का पंचम था !! लताजी के शास्त्रीय युगल गीतों में मन्ना डे जी ही सुयोग्य साथी थे तो महिला युगल गीतों में लता जी की छोटी बहन आशा भोंसले ही उनका साथ दे सकीं !! अंत में इतना ही लिखा जा सकता है कि लता याने कंठ माधुर्य का सर्वोच्च बिंदु ! लता याने संगीत मंदिर के सर्वोच्च शिखर पर चमकने वाला स्वर्ण कलश ! लता की गायकी याने कोहिनूर की जगमगाहट और ताजमहल का सौंदर्य !! लता याने ......" न भूतो न भविष्यती !! " * लेखक डॉ ईश्वरचंद्र रामचंद्र करकरे , एम बी बी एस , एम डी , एम ए संगीत , दूरदर्शन के शास्त्रीय गायक , आकाशवाणी चयन बोर्ड के सदस्य .