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माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित 'बलि-पंथी से' एक ओजपूर्ण देशभक्ति कविता है, जो मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले सैनिकों को प्रेरित करती है। यह कविता सैनिकों को कांटों (कष्टों) से न डरकर, फूलों (बलिदान) की तरह हंसकर देश के लिए मर मिटने और अपनी राह खुद बनाने का संदेश देती है। — माखनलाल चतुर्वेदी संकल्प और निडरता: कवि देश के शहीदों/सैनिकों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे वीर! तुम मार्ग के कष्टों (कांटों/शूल) को देखकर व्यर्थ में दुखी न हो। उन कष्टों को फूल मानकर सहजता से स्वीकार करो। ईश्वर पर भरोसा: अपने इष्ट (हरि) को हृदय में धारण करके, तुम सिंह (केहरि) की तरह बहादुरी से विपत्तियों को चीरते हुए आगे बढ़ो। कर्तव्य पथ: कवियों/गीदड़ों (कागों) की बातों में न आएं, कोयल (कोकिल) की मीठी आवाज़ के लालच को छोड़ें और अपने वीर रस (कर्तव्य-राग) को अपनाएं। त्याग की भावना: यदि स्वर्ग (सुरपुर) भी मिले, तो उसे ठुकराकर, यदि आवश्यक हो तो नरक (रौरव) के किनारे चलने को भी तैयार रहो, पर अपने कर्तव्य से विमुख न हो। राष्ट्र प्रेम: इस धरती को अपना बिस्तर और आकाश को ओढ़नी समझो। अपने जीवन को राष्ट्र के लिए समर्पित करो। मूल भाव: यह कविता सैनिकों को कठिन परिस्थितियों में भी कांटों की तरह चुभने के बजाय, फूलों की तरह मुस्कुराकर देश के लिए बलिदान होने की प्रेरण telegram Link 🔗 https://t.me/YOGDAN_ACADEMY