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यह पद गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'विनय पत्रिका' से लिया गया है। इसमें तुलसीदास जी भगवान राम के प्रति अपने अनन्य प्रेम और संसार की नश्वरता का बहुत ही सुंदर वर्णन कर रहे हैं।यहाँ इसका सरल अर्थ दिया गया है:भावार्थ1. जो मोहि राम लागते मीठे। तौ नवरस, षटरस-रस अनरस ह्वै जाते सब सीठे॥यदि मुझे श्री राम जी प्रिय (मीठे) लगने लगते, तो काव्य के नवरस (श्रृंगार, वीर आदि) और भोजन के षटरस (खट्टा, मीठा, तीखा आदि) मेरे लिए बेस्वाद और फीके हो जाते। कहने का तात्पर्य है कि राम-नाम के रस के आगे संसार के सभी भोग-विलास फीके पड़ जाते। 2. बंचक बिषय बिबिध तनु धरि अनुभवे, सुने अरु डीठे। यह जानत हौं ह्रदय आपने सपने न अघाइ उबीठे॥ये धोखेबाज 'विषय-भोग' (संसार की सुख-सुविधाएं) अनेक रूप धारण करके मेरे सामने आए; मैंने उन्हें भोगा, उनके बारे में सुना और उन्हें अपनी आँखों से देखा। फिर भी मेरा हृदय जानता है कि मैं इन्हें भोगते-भोगते कभी तृप्त (अघाइ) नहीं हुआ और न ही कभी इनसे मन भरा। ये प्यास कभी बुझती ही नहीं। 3. तुलसीदास प्रभु सो एकहिं बल बचन कहत अति ढीठे। नामकी लाज राम करुनाकर केहि न दिये कर चीठे॥तुलसीदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! मैं एक ही बल (भरोसे) पर बड़े ढीठ होकर आपसे ये वचन कह रहा हूँ। हे करुणा के सागर श्री राम! आपने अपने 'नाम' की लाज रखने के लिए क्या अब तक सबको शरण (अभय दान का पत्र/चीठा) नहीं दिया है? अर्थात् आपने पतितों का उद्धार केवल अपने नाम के प्रभाव से किया है, तो मेरा भी उद्धार करें।